ghazalKuch Alfaaz

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँँ उर्दू ज़बाँ आई क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे

Munawwar Rana

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ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है

Munawwar Rana

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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है

Munawwar Rana

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मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी मौत का आना तो तय है मौत आएगी मगर आप के आने से थोड़ी ज़िंदगी बढ़ जाएगी इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी बे-वफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे तज़्किरा उस से न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी

Munawwar Rana

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किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ मैं इस सुरंग से निकलूँ तू आब-जू हो जाऊँ बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ

Munawwar Rana

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