ghazalKuch Alfaaz

कुछ ने आँखें कुछ ने चेहरा देखा है सब ने तुझ को थोड़ा थोड़ा देखा है तुम पर प्यास के मा'नी खुलने वाले नहीं तुम ने पानी पी कर दरिया देखा है जिन हाथों को चूमने आ जाते थे लोग आज उन्हीं हाथों में कासा देखा है रोती आँखें ये सुन कर ख़ामोश हुईं मलबे में इक शख़्स को ज़िंदा देखा है बाबा बोला मेरी क़िस्मत अच्छी है उस ने शायद हाथ तुम्हारा देखा है लगता है मैं प्यास से मरने वाला हूँ मैं ने कल शब ख़्वाब में सहरा देखा है अंधी दुनिया को मैं कैसे समझाऊँ इन आँखों से मैं ने क्या क्या देखा है क़ैदी रात को भागने वाला है 'ताबिश' उस ने ख़्वाब में ख़ुफ़िया रस्ता देखा है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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आइने के रू-ब-रू इक आइना रखता हूँ मैं रात-दिन हैरत में ख़ुद को मुब्तला रखता हूँ मैं दोस्तों वाली भी इक ख़ूबी है उन में इस लिए दुश्मनों से भी मुसलसल राब्ता रखता हूँ मैं रोज़-ओ-शब मैं घूमता हूँ वक़्त की पुर-कार पर अपने चारों सम्त कोई दायरा रखता हूँ मैं खटखटाने की भी ज़हमत कोई आख़िर क्यूँँ करे इस लिए भी घर का दरवाज़ा खुला रखता हूँ मैं आज-कल ख़ुद से भी है रंजिश का कोई सिलसिला आज-कल ख़ुद से भी थोड़ा फ़ासला रखता हूँ मैं चंद यादें एक चेहरा एक ख़्वाहिश एक ख़्वाब अपने दिल में और क्या उन के सिवा रखता हूँ मैं चंद तस्वीरें किताबें ख़ुशबुएँ और एक फूल अपनी अलमारी में 'ताबिश' और क्या रखता हूँ मैं

Tousief Tabish

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मैं उस से बात करने जा चुका था मगर वो शख़्स आगे जा चुका था मुझे दरिया ने फिर ऊपर बुलाया मैं उस की हद से नीचे जा चुका था तिरे नक़्श-ए-क़दम पर चलते चलते मैं तुझ से कितना आगे जा चुका था पढ़ाई ख़त्म कर के जब मैं लौटा कोई अफ़सर उसे ले जा चुका था वो चलने को तो राज़ी हो गई थी मगर जब मैं अकेले जा चुका था सदाएँ दे रहा था वो पलट कर मगर मैं अपने रस्ते जा चुका था मैं ख़ुद को रोक भी सकता था 'ताबिश' कि मेरा वक़्त पीछे जा चुका था

Tousief Tabish

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बे-क़रारी सी बे-क़रारी है अब यही ज़िंदगी हमारी है मैं ने उस को पिछाड़ना है मियाँ मेरी साए से जंग जारी है इश्क़ करना भी लाज़मी है मगर मुझ पे घर की भी ज़िम्मेदारी है प्यार है मुझ को ज़िंदगी से बहुत और तू ज़िंदगी से प्यारी है मैं कभी ख़ुद को छोड़ता ही नहीं मेरी ख़ुद से अलग सी यारी है शहर का शहर सो गया 'ताबिश' अब मिरे जागने की बारी है

Tousief Tabish

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