ghazalKuch Alfaaz

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं और इस के बअ'द गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं तिरे होंटों के सहरा में तिरी आँखों के जंगल में जो अब तक पा चुका हूँ उस को खोना चाहता हूँ मैं ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले तिरी रफ़्तार का हम-रक़्स होना चाहता हूँ मैं तिरा साहिल नज़र आने से पहले इस समुंदर में हवस के सब सफ़ीनों को डुबोना चाहता हूँ मैं कभी तो फ़स्ल आएगी जहाँ में मेरे होने की तिरी ख़ाक-ए-बदन में ख़ुद को बोना चाहता हूँ मैं मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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है शोर साहिलों पर सैलाब आ रहा है आँखों को ग़र्क़ करने फिर ख़्वाब आ रहा है बस एक जिस्म दे कर रुख़्सत किया था उस ने और ये कहा था बाक़ी अस्बाब आ रहा है ख़ाक-ए-विसाल क्या क्या सूरत बदल रही है सूरज गुज़र चुका है महताब आ रहा है पानी के आइने में क्या आँख पड़ गई है दरिया में कैसा कैसा गिर्दाब आ रहा है आँखों की प्यालियों में बारिश मची हुई है सहरा में कोई मंज़र शादाब आ रहा है

Farhat Ehsaas

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तुम्हें उस से मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँँ नहीं करते किसी दिन उस के दर पे रक़्स-ए-वहशत क्यूँँ नहीं करते इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँँ नहीं करते तुम्हारे दिल पे अपना नाम लिक्खा हम ने देखा है हमारी चीज़ फिर हम को इनायत क्यूँँ नहीं करते मिरी दिल की तबाही की शिकायत पर कहा उस ने तुम अपने घर की चीज़ों की हिफ़ाज़त क्यूँँ नहीं करते बदन बैठा है कब से कासा-ए-उम्मीद की सूरत सो दे कर वस्ल की ख़ैरात रुख़्सत क्यूँँ नहीं करते क़यामत देखने के शौक़ में हम मर मिटे तुम पर क़यामत करने वालो अब क़यामत क्यूँँ नहीं करते मैं अपने साथ जज़्बों की जमाअत ले के आया हूँ जब इतने मुक़तदी हैं तो इमामत क्यूँँ नहीं करते तुम अपने होंठ आईने में देखो और फिर सोचो कि हम सिर्फ़ एक बोसे पर क़नाअ'त क्यूँँ नहीं करते बहुत नाराज़ है वो और उसे हम से शिकायत है कि इस नाराज़गी की भी शिकायत क्यूँँ नहीं करते कभी अल्लाह-मियाँ पूछेंगे तब उन को बताएँगे किसी को क्यूँँ बताएँ हम इबादत क्यूँँ नहीं करते मुरत्तब कर लिया है कुल्लियात-ए-ज़ख़्म अगर अपना तो फिर 'एहसास-जी' इस की इशाअ'त क्यूँँ नहीं करते

Farhat Ehsaas

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