ghazalKuch Alfaaz

मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की क़िस्मत खुली तिरे क़द-ओ-रुख़ से ज़ुहूर की इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की वाइ'ज़ न तुम पियो न किसी को पिला सको क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-तहूर की लड़ता है मुझ से हश्र में क़ातिल कि क्यूँँ उठा गोया अभी सुनी नहीं आवाज़ सूर की आमद बहार की है जो बुलबुल है नग़्मा-संज उड़ती सी इक ख़बर है ज़बानी तुयूर की गो वाँ नहीं प वाँ के निकाले हुए तो हैं का'बे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस क़दर की जिस से बात उस ने शिकायत ज़रूर की 'ग़ालिब' गर इस सफ़र में मुझे साथ ले चलें हज का सवाब नज़्र करूँँगा हुज़ूर की

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नहीं ऐसा भी कि यकसर नहीं रहने वाला दिल में ये शोर बराबर नहीं रहने वाला जिस तरह ख़ामुशी लफ़्ज़ों में ढली जाती है इस में तासीर का उंसुर नहीं रहने वाला अब ये किस शक्ल में ज़ाहिर हो, ख़ुदा ही जाने रंज ऐसा है कि अंदर नहीं रहने वाला मैं उसे छोड़ना चाहूँ भी तो कैसे छोड़ूँ? वो किसी और का हो कर नहीं रहने वाला ग़ौर से देख उन आँखों में नज़र आता है वो समुंदर जो समुंदर नहीं रहने वाला जुर्म वो करने का सोचा है कि बस अब की बार कोई इल्ज़ाम मिरे सर नहीं रहने वाला मैं ने हालाँकि बहुत वक़्त गुज़ारा है यहाँ अब मैं इस शहर में पल भर नहीं रहने वाला मस्लहत लफ़्ज़ पे दो हर्फ़ न भेजूँ? 'जव्वाद' जब मिरे साथ मुक़द्दर नहीं रहने वाला

Jawwad Sheikh

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किसी की मर्ज़ी को अपनी क़िस्मत बना चुके हैं हम अपने हाथों की सब लकीरें मिटा चुके हैं चलो समुंदर की वुसअतों में सुकून ढूँढ़े कि साहिलों पर बहुत घरौंदें बना चुके हैं उन्हीं छतों से हमारे आँगन में मौत बरसी वही छतें जिन से हम पतंगें उड़ा चुके हैं

Meraj Faizabadi

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इक दिन ज़बाँ सुकूत की पूरी बनाऊँगा मैं गुफ़्तुगू को ग़ैर-ज़रूरी बनाऊँगा तस्वीर में बनाऊँगा दोनों के हाथ और दोनों में एक हाथ की दूरी बनाऊँगा मुद्दत समेत जुमला ज़वाबित हों तय-शुदा या'नी तअ'ल्लुक़ात उबूरी बनाऊँगा तुझ को ख़बर न होगी कि मैं आस-पास हूँ इस बार हाज़िरी को हुज़ूरी बनाऊँगा रंगों पे इख़्तियार अगर मिल सका कभी तेरी सियाह पुतलियाँ भूरी बनाऊँगा जारी है अपनी ज़ात पे तहक़ीक़ आज-कल मैं भी ख़ला पे एक थ्योरी बनाऊँगा मैं चाह कर वो शक्ल मुकम्मल न कर सका उस को भी लग रहा था अधूरी बनाऊँगा

Umair Najmi

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पूरा दुख और आधा चाँद हिज्र की शब और ऐसा चाँद दिन में वहशत बहल गई रात हुई और निकला चाँद किस मक़्तल से गुज़रा होगा इतना सहमा सहमा चाँद यादों की आबाद गली में घूम रहा है तन्हा चाँद मेरी करवट पर जाग उट्ठे नींद का कितना कच्चा चाँद मेरे मुँह को किस हैरत से देख रहा है भोला चाँद इतने घने बादल के पीछे कितना तन्हा होगा चाँद आँसू रोके नूर नहाए दिल दरिया तन सहरा चाँद इतने रौशन चेहरे पर भी सूरज का है साया चाँद जब पानी में चेहरा देखा तू ने किस को सोचा चाँद बरगद की इक शाख़ हटा कर जाने किस को झाँका चाँद बादल के रेशम झूले में भोर समय तक सोया चाँद रात के शाने पर सर रक्खे देख रहा है सपना चाँद सूखे पत्तों के झुरमुट पर शबनम थी या नन्हा चाँद हाथ हिला कर रुख़्सत होगा उस की सूरत हिज्र का चाँद सहरा सहरा भटक रहा है अपने इश्क़ में सच्चा चाँद रात के शायद एक बजे हैं सोता होगा मेरा चाँद

Parveen Shakir

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मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी होती है दिलबरों की इनायत कभी कभी शर्मा के मुँह न फेर नज़र के सवाल पर लाती है ऐसे मोड़ पे क़िस्मत कभी कभी खुलते नहीं हैं रोज़ दरीचे बहार के आती है जान-ए-मन ये क़यामत कभी कभी तन्हा न कट सकेंगे जवानी के रास्ते पेश आएगी किसी की ज़रूरत कभी कभी फिर खो न जाएँ हम कहीं दुनिया की भीड़ में मिलती है पास आने की मोहलत कभी कभी

Sahir Ludhianvi

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दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया आतिश-ए-ख़ामोश की मानिंद गोया जल गया दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं आग इस घर में लगी ऐसी कि जो था जल गया मैं अदम से भी परे हूँ वर्ना ग़ाफ़िल बार-हा मेरी आह-ए-आतिशीं से बाल-ए-अन्क़ा जल गया अर्ज़ कीजे जौहर-ए-अंदेशा की गर्मी कहाँ कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जल गया दिल नहीं तुझ को दिखाता वर्ना दाग़ों की बहार इस चराग़ाँ का करूँँ क्या कार-फ़रमा जल गया मैं हूँ और अफ़्सुर्दगी की आरज़ू 'ग़ालिब' कि दिल देख कर तर्ज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया ख़ानमान-ए-आशिक़ाँ दुकान-ए-आतिश-बाज़ है शो'ला-रू जब हो गए गर्म-ए-तमाशा जल गया ता कुजा अफ़सोस-ए-गरमी-हा-ए-सोहबत ऐ ख़याल दिल बा-सोज़-ए-आतिश-ए-दाग़-ए-तमन्ना जल गया है 'असद' बेगाना-ए-अफ़्सुर्दगी ऐ बेकसी दिल ज़-अंदाज़-ए-तपाक-ए-अहल-ए-दुनिया जल गया दूद मेरा सुंबुलिस्ताँ से करे है हम-सरी बस-कि शौक़-ए-आतिश-गुल से सरापा जल गया शम्अ-रूयाँ की सर-अंगुश्त-ए-हिनाई देख कर ग़ुंचा-ए-गुल पर-फ़िशाँ परवाना-आसा जल गया

Mirza Ghalib

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कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया दिल कहाँ कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ' पाया इश्क़ से तबीअ'त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया दोस्त-दार-ए-दुश्मन है ए'तिमाद-ए-दिल मा'लूम आह बे-असर देखी नाला ना-रसा पाया सादगी ओ पुरकारी बे-ख़ुदी ओ हुश्यारी हुस्न को तग़ाफ़ुल में जुरअत-आज़मा पाया ग़ुंचा फिर लगा खिलने आज हम ने अपना दिल ख़ूँ किया हुआ देखा गुम किया हुआ पाया हाल-ए-दिल नहीं मा'लूम लेकिन इस क़दर या'नी हम ने बार-हा ढूँडा तुम ने बार-हा पाया शोर-ए-पंद-ए-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का आप से कोई पूछे तुम ने क्या मज़ा पाया है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब हम ने दश्त-ए-इम्काँ को एक नक़्श-ए-पा पाया बे-दिमाग़-ए-ख़जलत हूँ रश्क-ए-इम्तिहाँ ता-कै एक बेकसी तुझ को आलम-आश्ना पाया ख़ाक-बाज़ी-ए-उम्मीद कार-ख़ाना-ए-तिफ़्ली यास को दो-आलम से लब-ब-ख़ंदा वा पाया क्यूँँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया शब नज़ारा-परवर था ख़्वाब में ख़याल उस का सुब्ह मौजा-ए-गुल को नक़्श-ए-बोरिया पाया जिस क़दर जिगर ख़ूँ हो कूचा दादन-ए-गुल है ज़ख्म-ए-तेग़-ए-क़ातिल को तुर्फ़ा दिल-कुशा पाया है मकीं की पा-दारी नाम-ए-साहिब-ए-ख़ाना हम से तेरे कूचे ने नक़्श-ए-मुद्दआ पाया ने 'असद' जफ़ा-साइल ने सितम जुनूँ-माइल तुझ को जिस क़दर ढूँडा उल्फ़त-आज़मा पाया

Mirza Ghalib

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जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार सहरा मगर ब-तंगी-ए-चश्म-ए-हसूद था आशुफ़्तगी ने नक़्श-ए-सुवैदा किया दुरुस्त ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था था ख़्वाब में ख़याल को तुझ से मुआ'मला जब आँख खुल गई न ज़ियाँ था न सूद था लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हनूज़ लेकिन यही कि रफ़्त गया और बूद था ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगी मैं वर्ना हर लिबास में नंग-ए-वजूद था तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद' सरगश्ता-ए-ख़ुमार-ए-रुसूम-ओ-क़ुयूद था आलम जहाँ ब-अर्ज़-ए-बिसात-ए-वजूद था जूँ सुब्ह चाक-ए-जेब मुझे तार-ओ-पूद था बाज़ी-ख़ुर-ए-फ़रेब है अहल-ए-नज़र का ज़ौक़ हंगामा गर्म-ए-हैरत-ए-बूद-ओ-नबूद था आलम तिलिस्म-ए-शहर-ए-ख़मोशी है सर-बसर या मैं ग़रीब-ए-किश्वर-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था तंगी रफ़ीक़-ए-रह थी अदम या वजूद था मेरा सफ़र ब-ताला-ए-चश्म-ए-हसूद था तू यक-जहाँ क़माश-ए-हवस जम्अ'' कर कि मैं हैरत-मता-ए-आलम-ए-नुक़्सान-ओ-सूद था गर्दिश-मुहीत-ए-ज़ुल्म रहा जिस क़दर फ़लक मैं पाएमाल-ए-ग़म्ज़ा-ए-चश्म-ए-कबूद था पूछा था गरचे यार ने अहवाल-ए-दिल मगर किस को दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद था ख़ुर शबनम-आश्ना न हुआ वर्ना मैं 'असद' सर-ता-क़दम गुज़ारिश-ए-ज़ौक़-ए-सुजूद था

Mirza Ghalib

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं ग़ैर की बात बिगड़ जाए तो कुछ दूर नहीं वादा-ए-सैर-ए-गुलिस्ताँ है ख़ुशा ताले-ए-शौक़ मुज़्दा-ए-क़त्ल मुक़द्दर है जो मज़कूर नहीं शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं हसरत ऐ ज़ौक़-ए-ख़राबी कि वो ताक़त न रही इश्क़-ए-पुर-अरबदा की गूँ तन-ए-रंजूर नहीं मैं जो कहता हूँ कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हें किस र'ऊनत से वो कहते हैं कि हम हूर नहीं ज़ुल्म कर ज़ुल्म अगर लुत्फ़ दरेग़ आता हो तू तग़ाफ़ुल में किसी रंग से मा'ज़ूर नहीं साफ़ दुर्दी-कश-ए-पैमाना-ए-जम हैं हम लोग वाए वो बादा कि अफ़्शुर्दा-ए-अंगूर नहीं हूँ ज़ुहूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई 'ग़ालिब' मेरे दावे पे ये हुज्जत है कि मशहूर नहीं

Mirza Ghalib

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