masti-e-rindana ham sairabi-e-mai-khana ham gardish-e-taqdir se hain gardish-e-paimana ham khun-e-dil se chashm-e-tar tak chashm-e-tar se ta-ba-khak kar gae akhir gul-o-gulzar har virana ham kya bala jabr-e-asiri hai ki azadi men bhi dosh par apne liye phirte hain zindan-khana ham raah men faujon ke pahre sar pe talvaron ki chhanv aae hain zindan men bhi ba-shaukat-e-shahana ham mitte mitte de gae ham zindagi ko rang-o-nur rafta rafta ban gae is ahd ka afsana ham ya jaga dete hain zarron ke dilon men mai-kade ya bana lete hain mehr-o-mah ko paimana ham qaid ho kar aur bhi zindan men udta hai khayal raqs zanjiron men bhi karte hain azadana ham masti-e-rindana hum sairabi-e-mai-khana hum gardish-e-taqdir se hain gardish-e-paimana hum khun-e-dil se chashm-e-tar tak chashm-e-tar se ta-ba-khak kar gae aakhir gul-o-gulzar har virana hum kya bala jabr-e-asiri hai ki aazadi mein bhi dosh par apne liye phirte hain zindan-khana hum rah mein faujon ke pahre sar pe talwaron ki chhanw aae hain zindan mein bhi ba-shaukat-e-shahana hum mitte mitte de gae hum zindagi ko rang-o-nur rafta rafta ban gae is ahd ka afsana hum ya jaga dete hain zarron ke dilon mein mai-kade ya bana lete hain mehr-o-mah ko paimana hum qaid ho kar aur bhi zindan mein udta hai khayal raqs zanjiron mein bhi karte hain aazadana hum
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो
Himanshi babra KATIB
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More from Ali Sardar Jafri
लग़्ज़िश-ए-गाम लिए लग़्ज़िश-ए-मस्ताना लिए आए हम बज़्म में फिर जुरअत-ए-रिंदाना लिए इश्क़ पहलू में है फिर जल्वा-ए-जानाना लिए ज़ुल्फ़ इक हाथ में इक हाथ में पैमाना लिए याद करता था हमें साक़ी-ओ-मीना का हुजूम उठ गए थे जो कभी रौनक़-ए-मय-ख़ाना लिए वस्ल की सुब्ह शब-ए-हिज्र के बा'द आई है आफ़्ताब-ए-रुख़-ए-महबूब का नज़राना लिए अस्र-ए-हाज़िर को मुबारक हो नया दौर-ए-अवाम अपनी ठोकर में सर-ए-शौकत-ए-शाहाना लिए
Ali Sardar Jafri
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अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ गुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन दिल की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शो'ला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर-ए-अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती
Ali Sardar Jafri
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अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा अदम हयात से पहले अदम हयात के बा'द ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा रह-ए-दराज़ है और दूर शौक़ की मंज़िल गराँ है मरहला-ए-उम्र गीत गाता जा बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा जो हो सके तो बदल ज़िंदगी को ख़ुद वर्ना नज़ाद-ए-नौ को तरीक़-ए-जुनूँ सिखाता जा दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा
Ali Sardar Jafri
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अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शोला-सामानी नहीं जाती ख़ुदा मालूम किस किस के लहू की लाला-कारी है ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आज पहचानी नहीं जाती अगर यूँँ है तो क्यूँँ है यूँँ नहीं तो क्यूँँ नहीं आख़िर यक़ीं मोहकम है लेकिन ज़िद की हैरानी नहीं जाती लहू जितना था सारा सर्फ़-ए-मक़्तल हो गया लेकिन शहीदान-ए-वफ़ा के रुख़ की ताबानी नहीं जाती परेशाँ-रोज़गार आशुफ़्ता-हालाँ का मुक़द्दर है कि उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की परेशानी नहीं जाती हर इक शय और महँगी और महँगी होती जाती है बस इक ख़ून-ए-बशर है जिस की अर्ज़ानी नहीं जाती ये नग़्मा नग़्मा-ए-बेदारी-ए-जम्हूर-ए-आलम है वो शमशीर-ए-नवा जिस की दरख़शानी नहीं जाती नए ख़्वाबों के दिल में शोला-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर है ज़मीर-ए-हज़रत-ए-इंसाँ की सुलतानी नहीं जाती लगाते हैं लबों पर मोहर अर्बाब-ए-ज़बाँ-बंदी अली-'सरदार' की शान-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती
Ali Sardar Jafri
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मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जाँ तक आओ फिर ये देखो कि ज़माने की हवा है कैसी साथ मेरे मिरे फ़िरदौस-ए-जवाँ तक आओ हौसला हो तो उड़ो मेरे तसव्वुर की तरह मेरी तख़्य्युल के गुलज़ार-ए-जिनाँ तक आओ फूल के गिर्द फिरो बाग़ में मानिंद-ए-नसीम मिस्ल-ए-परवाना किसी शम-ए-तपाँ तक आओ लो वो सदियों के जहन्नम की हदें ख़त्म हुईं अब है फ़िरदौस ही फ़िरदौस जहाँ तक आओ छोड़ कर वहम-ओ-गुमां हुस्न-ए-यक़ीं तक पहुंचो पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमां तक आओ इसी दुनिया में दिखा दें तुम्हें जन्नत की बहार शैख़-जी तुम भी ज़रा कू-ए-बुताँ तक आओ
Ali Sardar Jafri
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