मेरे दिल में उतर गया सूरज तीरगी में निखर गया सूरज दर्स दे कर हमें उजाले का ख़ुद अँधेरे के घर गया सूरज हम से वा'दा था इक सवेरे का हाए कैसे मुकर गया सूरज चाँदनी अक्स चाँद आईना आइने में सँवर गया सूरज डूबते वक़्त ज़र्द था उतना लोग समझे कि मर गया सूरज
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है न जलने पाते थे जिस के चूल्हे भी हर सवेरे सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है मैं जानता हूँ कि ख़ामुशी में ही मस्लहत है मगर यही मस्लहत मिरे दिल को खल रही है कभी तो इंसान ज़िंदगी की करेगा इज़्ज़त ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है
Javed Akhtar
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ग़म होते हैं जहाँ ज़ेहानत होती है दुनिया में हर शय की क़ीमत होती है अक्सर वो कहते हैं वो बस मेरे हैं अक्सर क्यूँँ कहते हैं हैरत होती है तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है अपनी महबूबा में अपनी माँ देखें बिन माँ के लड़कों की फ़ितरत होती है इक कश्ती में एक क़दम ही रखते हैं कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है
Javed Akhtar
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यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा तो शुक्र कीजिए कि अब कोई गिला नहीं रहा न हिज्र है न वस्ल है अब इस को कोई क्या कहे कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा ख़ज़ाना तुम न पाए तो ग़रीब जैसे हो गए पलक पे अब कोई भी मोती झिलमिला नहीं रहा बदल गई है ज़िंदगी बदल गए हैं लोग भी ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा जो दुश्मनी बख़ील से हुई तो इतनी ख़ैर है कि ज़हर उस के पास है मगर पिला नहीं रहा
Javed Akhtar
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बहाना ढूँडते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का जो फ़स्ल ख़्वाब की तय्यार है तो ये जानो कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का है पाश पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का
Javed Akhtar
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हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है मगर वो बात पहले सी नहीं है मुझे मायूस भी करती नहीं है यही आदत तिरी अच्छी नहीं है बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत में मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे कभी हम ने मोहब्बत की नहीं है है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया मफ़र ग़म से यहाँ कोई नहीं है
Javed Akhtar
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