ghazalKuch Alfaaz

मोहब्बत की दुनिया में मशहूर कर दूँ मिरी सादा-दिल तुझ को मग़रूर कर दूँ तिरे दिल को मिलने की ख़ुद आरज़ू हो तुझे इस क़दर ग़म से रंजूर कर दूँ मुझे ज़िंदगी दूर रखती है तुझ से जो तू पास हो तो उसे दूर कर दूँ मोहब्बत के इक़रार से शर्म कब तक कभी सामना हो तो मजबूर कर दूँ मिरे दिल में है शोला-ए-हुस्न रक़्साँ मैं चाहूँ तो हर ज़र्रे को तूर कर दूँ ये बे-रंगियाँ कब तक ऐ हुस्न-ए-रंगीं इधर आ तुझे इश्क़ में चूर कर दूँ तू गर सामने हो तो मैं बे-ख़ुदी में सितारों को सज्दे पे मजबूर कर दूँ सियह-ख़ाना-ए-ग़म है साक़ी ज़माना बस इक जाम और नूर ही नूर कर दूँ नहीं ज़िंदगी को वफ़ा वर्ना 'अख़्तर' मोहब्बत से दुनिया को मामूर कर दूँ

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

190 likes

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

92 likes

More from Akhtar Shirani

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें मोहब्बत करें ख़ुश रहें मुस्कुरा दें ग़ुरूर और हमारा ग़ुरूर-ए-मोहब्बत मह ओ मेहर को उन के दर पर झुका दें जवानी हो गर जावेदानी तो या रब तिरी सादा दुनिया को जन्नत बना दें शब-ए-वस्ल की बे-ख़ुदी छा रही है कहो तो सितारों की शमएँ बुझा दें बहारें सिमट आएँ खिल जाएँ कलियाँ जो हम तुम चमन में कभी मुस्कुरा दें इबादत है इक बे-ख़ुदी से इबारत हरम को मय-ए-मुश्क-बू से बसा दें वो आएँगे आज ऐ बहार-ए-मोहब्बत सितारों के बिस्तर पे कलियाँ बिछा दें बनाता है मुँह तल्ख़ी-ए-मय से ज़ाहिद तुझे बाग़-ए-रिज़वाँ से कौसर मँगा दें जिन्हें उम्र भर याद आना सिखाया वो दिल से तिरी याद क्यूँँकर भुला दें तुम अफ़्साना-ए-क़ैस क्या पूछते हो इधर आओ हम तुम को लैला बना दें ये बे-दर्दियाँ कब तक ऐ दर्द-ए-ग़ुर्बत बुतों को फिर अर्ज़-ए-हरम में बसा दें वो सरमस्तियाँ बख़्श ऐ रश्क-ए-शीरीं कि ख़ुसरू को ख़्वाब-ए-अदम से जगा दें तिरे वस्ल की बे-ख़ुदी कह रही है ख़ुदाई तो क्या हम ख़ुदा को भुला दें उन्हें अपनी सूरत पे यूँँ नाज़ कब था मिरे इश्क़-ए-रुस्वा को 'अख़्तर' दुआ दें

Akhtar Shirani

1 likes

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें मुझ को ये ए'तिराफ़ दु'आओं में है असर जाएँ न अर्श पर जो दुआएँ तो क्या करें इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम नाज़िल हों दिल पे रोज़ बलाएँ तो क्या करें ज़ुल्मत-ब-दोश है मिरी दुनिया-ए-आशिक़ी तारों की मिशअले न चुराएँ तो क्या करें शब भर तो उन की याद में तारे गिना किए तारे से दिन को भी नज़र आएँ तो क्या करें अहद-ए-तरब की याद में रोया किए बहुत अब मुस्कुरा के भूल न जाएँ तो क्या करें अब जी में है कि उन को भुला कर ही देख लें वो बार बार याद जो आएँ तो क्या करें वअ'दे के ए'तिबार में तस्कीन-ए-दिल तो है अब फिर वही फ़रेब न खाएँ तो क्या करें तर्क-ए-वफ़ा भी जुर्म-ए-मोहब्बत सही मगर मिलने लगें वफ़ा की सज़ाएँ तो क्या करें

Akhtar Shirani

0 likes

ग़म-ए-ज़माना नहीं इक अज़ाब है साक़ी शराब ला मिरी हालत ख़राब है साक़ी शबाब के लिए तौबा अज़ाब है साक़ी शराब ला मुझे पास-ए-शबाब है साक़ी उठा पियाला कि गुलशन पे फिर बरसने लगी वो मय कि जिस का क़दह माहताब है साक़ी निकाल पर्दा-ए-मीना से दुख़्तर-ए-रज़ को घटा में किस लिए ये माहताब है साक़ी तू वाइ'ज़ों की न सुन मय-कशों की ख़िदमत कर गुनह सवाब की ख़ातिर सवाब है साक़ी ज़माने-भर के ग़मों को है दावत-ए-ग़र्रा कि एक जाम में सब का जवाब है साक़ी कलाम जिस का है मे'राज 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम' यही वो 'अख़्तर'-ए-ख़ाना-ख़राब है साक़ी

Akhtar Shirani

0 likes

ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ ज़िंदगानी फिर कहाँ नादाँ जवानी फिर कहाँ दो घड़ी मिल बैठने को भी ग़नीमत जानिए उम्र फ़ानी ही सही ये उम्र-ए-फ़ानी फिर कहाँ आ कि हम भी इक तराना झूम कर गाते चलें इस चमन के ताएरों की हम-ज़बानी फिर कहाँ है ज़माना इश्क़-ए-सलमा में गँवा दे ज़िंदगी ये ज़माना फिर कहाँ ये ज़िंदगानी फिर कहाँ एक ही बस्ती में हैं आसाँ है मिलना आ मिलो क्या ख़बर ले जाए दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ फ़स्ल-ए-गुल जाने को है दौर-ए-ख़िज़ाँ आने को है ये चमन ये बुलबुलें ये नग़्मा-ख़्वानी फिर कहाँ फूल चुन जी खोल कर ऐश-ओ-तरब के फूल चुन मौसम-ए-गुल फिर कहाँ फस्ल-ए-जवानी फिर कहाँ आख़िरी रात आ गई जी भर के मिल लें आज तो तुम से मिलने देगा दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ आज आए हो तो सुनते जाओ ये ताज़ा ग़ज़ल वर्ना 'अख़्तर' फिर कहाँ ये शेर-ख़्वानी फिर कहाँ

Akhtar Shirani

1 likes

याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो अपनी और मेरी जवानी को न बर्बाद करो शर्म रोने भी न दे बेकली सोने भी न दे इस तरह तो मिरी रातों को न बर्बाद करो हद है पीने की कि ख़ुद पीर-ए-मुग़ाँ कहता है इस बुरी तरह जवानी को न बर्बाद करो याद आते हो बहुत दिल से भुलाने वालो तुम हमें याद करो तुम हमें क्यूँँ याद करो आसमाँ रुत्बा महल अपने बनाने वालो दिल का उजड़ा हुआ घर भी कोई आबाद करो हम कभी आएँ तिरे घर मगर आएँगे ज़रूर तुम ने ये वा'दा किया था कि नहीं याद करो चाँदनी रात में गुल-गश्त को जब जाते थे आह अज़रा कभी उस वक़्त को भी याद करो मैं भी शाइस्ता-ए-अल्ताफ़-ए-सितम हूँ शायद मेरे होते हुए क्यूँँ ग़ैर पे बेदाद करो सदक़े उस शोख़ के 'अख़्तर' ये लिखा है जिस ने इश्क़ में अपनी जवानी को न बर्बाद करो

Akhtar Shirani

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Akhtar Shirani.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Akhtar Shirani's ghazal.