मुझे अपनी ख़बर नहीं होती थी, एहसास नहीं होता था कोई मगर इस का ये मतलब नहीं है मेरे पास नहीं होता था कोई इक ऐसी चुड़ैल के ज़द में था मैं पिछली बरस की शामों में जो ऐसी जगह से भी नोचती थी जहाँ मास नहीं होता था कोई मुझे जड़ से उखाड़ने वालों की साँसों का उखड़ना रिवायत है मैं पेड़ नहीं होता था कोई मैं घास नहीं होता था कोई
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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वो जो मेरी ताबकारी में पिघलने लग गया जो सितारा भी नहीं था वो भी जलने लग गया ख़ूब-सूरत औरतों ने कर दी बीनाई अता आँख मलने वाला आख़िर हाथ मलने लग गया दूसरा पाँव नहीं रखने दिया मैं ने उसे पहला पाँव रखते ही चश्मा उबलने लग गया
Muzdum Khan
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मुझे न माँगती तो बोलती ख़ुदा दो मुझे बचा लिया है गुनाह से तुम्हें दुआ दो मुझे ये लोग देख रहें हैं मेरी चमक में तुम्हें कहीं अकेले जलाना अभी बुझा दो मुझे मुझे किसी से मुहब्बत नहीं तुम्हारे सिवा तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो बता दो मुझे
Muzdum Khan
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किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम
Muzdum Khan
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हमारा दिल जब नहीं लगा तो सवाल पैदा हुआ लगेगा जवाब में हमनें कह दिया ठीक है मगर और क्या लगेगा अ गर कभी तीर चूम कर वो मेरी तरफ़ छोड़ दे कमां से मेरा मुक़द्दर तो इस तरह का है तीर दुश्मन को जा लगेगा कि दोस्त ऐसे मुआशरे में मुआशका चाहते हैं मुझ सेे मैं जिस में थप्पड़ भी खाना चाहूँ तो वो भी बुर्के में आ लगेगा हमारा नक़्शा किराया मेहनत दिमाग लगता है रास्तों पर तुम्हारी तो इनसे दोस्ती है तुम्हारा तो शुक्रिया लगेगा मुशायरों में ग़ज़ल नहीं लोग सिर्फ़ हुलियों को देखते हैं मेरा भी एक दोस्त है जो हँसने के बा'द जॉन एलिया लगेगा
Muzdum Khan
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तेरी तस्वीर मोअत्तल नहीं होती मेरे दोस्त वरना दीवार तो पागल नहीं होती मेरे दोस्त इश्क़ में जीत मुक़द्दर से है मेहनत से नहीं ऐसे खेलों में रिहर्सल नहीं होती मेरे दोस्त उस ने बेचैनी भी बख़्शी है बड़ी मुश्किल से और बेचैनी मुसलसल नहीं होती मेरे दोस्त
Muzdum Khan
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