मुझ से बनता हुआ तू तुझ को बनाता हुआ मैं गीत होता हुआ तू गीत सुनाता हुआ मैं एक कूज़े के तसव्वुर से जुड़े हम दोनों नक़्श देता हुआ तू चाक घुमाता हुआ मैं तुम बनाओ किसी तस्वीर में कोई रस्ता मैं बनाता हूँ कहीं दूर से आता हुआ मैं एक तस्वीर की तकमील के हम दो पहलू रंग भरता हुआ तू रंग बनाता हुआ मैं मुझ को ले जाए कहीं दूर बहाती हुई तू तुझ को ले जाऊँ कहीं दूर उड़ाता हुआ मैं इक इबारत है जो तहरीर नहीं हो पाई मुझ को लिखता हुआ तू तुझ को मिटाता हुआ मैं मेरे सीने में कहीं ख़ुद को छुपाता हुआ तू तेरे सीने से तिरा दर्द चुराता हुआ मैं काँच का हो के मिरे आगे बिखरता हुआ तू किर्चियों को तिरी पलकों से उठाता हुआ मैं
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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जहल को आगही बनाते हुए मिल गया रौशनी बनाते हुए क्या क़यामत किसी पे गुज़रेगी आख़िरी आदमी बनाते हुए क्या हुआ था ज़रा पता तो चले वक़्त क्या था घड़ी बनाते हुए कैसे कैसे बना दिए चेहरे अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए दश्त की वुसअतें बढ़ाती थीं मेरी आवारगी बनाते हुए उस ने नासूर कर लिया होगा ज़ख़्म को शाएरी बनाते हुए
Ammar Iqbal
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तीरगी ताक़ में जड़ी हुई है धूप दहलीज़ पर पड़ी हुई है दिल पे नाकामियों के हैं पैवंद आस की सोई भी गड़ी हुई है मेरे जैसी है मेरी परछाईं धूप में पल के ये बड़ी हुई है घेर रक्खा है ना-रसाई ने और ख़्वाहिश वहीं खड़ी हुई है मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर कील दीवार में गड़ी हुई है हारता भी नहीं ग़म-ए-दौराँ ज़िद पे उम्मीद भी अड़ी हुई है दिल किसी के ख़याल में है गुम रात को ख़्वाब की पड़ी हुई है
Ammar Iqbal
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यूँँही बे-बाल-ओ-पर खड़े हुए हैं हम क़फ़स तोड़ कर खड़े हुए हैं दश्त गुज़रा है मेरे कमरे से और दीवार-ओ-दर खड़े हुए हैं ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं और कितनी घुमाओगे दुनिया हम तो सर थाम कर खड़े हुए हैं बरगुज़ीदा बुज़ुर्ग नीम के पेड़ थक गए हैं मगर खड़े हुए हैं मुद्दतों से हज़ार-हा आलम एक उम्मीद पर खड़े हुए हैं
Ammar Iqbal
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पहले हमारी आँख में बीनाई आई थी फिर इस के बा'द क़ुव्वत-ए-गोयाई आई थी मैं अपनी ख़स्तगी से हुआ और पाएदार मेरी थकन से मुझ में तवानाई आई थी दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी वो किस की नग़्मगी थी जो दारों सरों में थी रंगों में किस के रंग से रा'नाई आई थी फिर यूँँ हुआ कि उस को तमन्नाई कर लिया मेरी तरफ़ जो चश्म-ए-तमाशाई आई थी
Ammar Iqbal
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ख़ुद-परस्ती से इश्क़ हो गया है अपनी हस्ती से इश्क़ हो गया है जब से देखा है इस फ़क़ीरनी को फ़ाक़ा-मस्ती से इश्क़ हो गया है एक दरवेश को तिरी ख़ातिर सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है ख़ुद तराशा है जब से बुत अपना बुत-परस्ती से इश्क़ हो गया है ये फ़लक-ज़ाद की कहानी है इस को पस्ती से इश्क़ हो गया है
Ammar Iqbal
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