न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा
Related Ghazal
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
More from Chakbast Brij Narayan
मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये सुरूर-ए-साग़र-ए-मय नहीं ये ख़ुमार-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं जो ज़ुहूर-ए-आलम-ए-ज़ात है ये फ़क़त हुजूम-ए-सिफ़ात है है जहाँ का और वजूद क्या जो तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये हयात आलम-ए-ख़्वाब है न गुनाह है न सवाब है वही कुफ़्र-ओ-दीं में ख़राब है जिसे इल्म-ए-राज़-ए-जहाँ नहीं न वो ख़ुम में बादे का जोश है न वो हुस्न जल्वा-फ़रोश है न किसी को रात का होश है वो सहर कि शब का गुमाँ नहीं वो ज़मीं पे जिन का था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था उन्हें यूँँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशाँ नहीं
Chakbast Brij Narayan
0 likes
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना रोके दुनिया में है यूँँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह अपने ही साए से गुरेज़ाँ होना ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना दफ़्तर-ए-हुस्न पे मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो फूल का ख़ाक के तोदे से नुमायाँ होना दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का वलवलों के लिए मुमकिन नहीं ज़िंदाँ होना गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गुहर के मालिक है उसे तुर्रा-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़ कर नंग है मेरे लिए चाक-गरेबाँ होना क़ैद यूसुफ़ को ज़ुलेख़ा ने किया कुछ न किया दिल-ए-यूसुफ़ के लिए शर्त था ज़िंदाँ होना
Chakbast Brij Narayan
1 likes
हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा है बाग़ में गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं
Chakbast Brij Narayan
0 likes
फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना अजल क्या है ख़ुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मर्दाना खुलते हैं मुबारक बुज़दिलों को गर्दिश-ए-क़िस्मत से डर जाना वो तब्-ए-यास-परवर ने मुझे चश्म-ए-अक़ीदत दी कि शाम-ए-ग़म की तारीकी को भी नूर-ए-सहर जाना बहुत सौदा रहा वाइज़ तुझे नार-ए-जहन्नम का मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ऐ बे-ख़बर जाना करिश्मा ये भी है ऐ बे-ख़बर इफ़्लास-ए-क़ौमी का तलाश-ए-रिज़्क़ में अहल-ए-हुनर का दर-ब-दर जाना अजल की नींद में भी ख़्वाब-ए-हस्ती गर नज़र आया तो फिर बेकार है तंग आ के इस दुनिया से मर जाना वो सौदा ज़िंदगी का है कि ग़म इंसान सहता है नहीं तो है बहुत आसान इस जीने से मर जाना चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में उसी ने बाग़बानी की कि जिस ने अपनी मेहनत को ही मेहनत का समर जाना सिधारी मंज़िल-ए-हस्ती से कुछ बे-ए'तिनाई से तन-ए-ख़ाकी को शायद रूह ने गर्द-ए-सफ़र जाना
Chakbast Brij Narayan
0 likes
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़ सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है ये रंग-ए-बे-कसी रंग-ए-जुनूँ बन जाएगा ग़ाफ़िल समझ ले यास-ओ-हिरमाँ के मरज़ की इंतिहा क्या है नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है उमीदें मिल गईं मिट्टी में दौर-ए-ज़ब्त-ए-आख़िर है सदा-ए-ग़ैब बतला दे हमें हुक्म-ए-ख़ुदा क्या है
Chakbast Brij Narayan
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Chakbast Brij Narayan.
Similar Moods
More moods that pair well with Chakbast Brij Narayan's ghazal.







