फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना अजल क्या है ख़ुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मर्दाना खुलते हैं मुबारक बुज़दिलों को गर्दिश-ए-क़िस्मत से डर जाना वो तब्-ए-यास-परवर ने मुझे चश्म-ए-अक़ीदत दी कि शाम-ए-ग़म की तारीकी को भी नूर-ए-सहर जाना बहुत सौदा रहा वाइज़ तुझे नार-ए-जहन्नम का मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ऐ बे-ख़बर जाना करिश्मा ये भी है ऐ बे-ख़बर इफ़्लास-ए-क़ौमी का तलाश-ए-रिज़्क़ में अहल-ए-हुनर का दर-ब-दर जाना अजल की नींद में भी ख़्वाब-ए-हस्ती गर नज़र आया तो फिर बेकार है तंग आ के इस दुनिया से मर जाना वो सौदा ज़िंदगी का है कि ग़म इंसान सहता है नहीं तो है बहुत आसान इस जीने से मर जाना चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में उसी ने बाग़बानी की कि जिस ने अपनी मेहनत को ही मेहनत का समर जाना सिधारी मंज़िल-ए-हस्ती से कुछ बे-ए'तिनाई से तन-ए-ख़ाकी को शायद रूह ने गर्द-ए-सफ़र जाना
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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जब वो मेरे शाना-ब-शाना चलता है पस मंज़र में कोई गाना चलता है मैं पूरी ज़िम्मेदारी से पीता हूँ मेरी लग़ज़िश से मयख़ाना चलता है आवारा'गर्दी पर लानत है लेकिन एक गली में आना-जाना चलता है पल-पल में बिजली के झटके देते हो ऐसे तो बस पागल-ख़ाना चलता है आप किसी मौक़े' पर मातम करते हैं हम लोगों का तो रोज़ाना चलता है तुम को मेरी चाल पे फ़िक़्रे कसने थे कस लो कमर को अब दीवाना चलता है
Zubair Ali Tabish
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना रोके दुनिया में है यूँँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह अपने ही साए से गुरेज़ाँ होना ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना दफ़्तर-ए-हुस्न पे मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो फूल का ख़ाक के तोदे से नुमायाँ होना दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का वलवलों के लिए मुमकिन नहीं ज़िंदाँ होना गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गुहर के मालिक है उसे तुर्रा-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़ कर नंग है मेरे लिए चाक-गरेबाँ होना क़ैद यूसुफ़ को ज़ुलेख़ा ने किया कुछ न किया दिल-ए-यूसुफ़ के लिए शर्त था ज़िंदाँ होना
Chakbast Brij Narayan
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न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा
Chakbast Brij Narayan
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अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता हज़ारों जान देते हैं बुतों की बे-वफ़ाई पर अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता
Chakbast Brij Narayan
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मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये सुरूर-ए-साग़र-ए-मय नहीं ये ख़ुमार-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं जो ज़ुहूर-ए-आलम-ए-ज़ात है ये फ़क़त हुजूम-ए-सिफ़ात है है जहाँ का और वजूद क्या जो तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये हयात आलम-ए-ख़्वाब है न गुनाह है न सवाब है वही कुफ़्र-ओ-दीं में ख़राब है जिसे इल्म-ए-राज़-ए-जहाँ नहीं न वो ख़ुम में बादे का जोश है न वो हुस्न जल्वा-फ़रोश है न किसी को रात का होश है वो सहर कि शब का गुमाँ नहीं वो ज़मीं पे जिन का था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था उन्हें यूँँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशाँ नहीं
Chakbast Brij Narayan
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हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा है बाग़ में गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं
Chakbast Brij Narayan
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