हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं जन्नत में ख़ाक बादा-परस्तों का दिल लगे नक़्शे नज़र में सोहबत पीर-ए-मुग़ाँ के हैं अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा है बाग़ में गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना रोके दुनिया में है यूँँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह अपने ही साए से गुरेज़ाँ होना ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना दफ़्तर-ए-हुस्न पे मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो फूल का ख़ाक के तोदे से नुमायाँ होना दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का वलवलों के लिए मुमकिन नहीं ज़िंदाँ होना गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गुहर के मालिक है उसे तुर्रा-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़ कर नंग है मेरे लिए चाक-गरेबाँ होना क़ैद यूसुफ़ को ज़ुलेख़ा ने किया कुछ न किया दिल-ए-यूसुफ़ के लिए शर्त था ज़िंदाँ होना
Chakbast Brij Narayan
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मिरी बे-ख़ुदी है वो बे-ख़ुदी कि ख़ुदी का वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये सुरूर-ए-साग़र-ए-मय नहीं ये ख़ुमार-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं जो ज़ुहूर-ए-आलम-ए-ज़ात है ये फ़क़त हुजूम-ए-सिफ़ात है है जहाँ का और वजूद क्या जो तिलिस्म-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं ये हयात आलम-ए-ख़्वाब है न गुनाह है न सवाब है वही कुफ़्र-ओ-दीं में ख़राब है जिसे इल्म-ए-राज़-ए-जहाँ नहीं न वो ख़ुम में बादे का जोश है न वो हुस्न जल्वा-फ़रोश है न किसी को रात का होश है वो सहर कि शब का गुमाँ नहीं वो ज़मीं पे जिन का था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था उन्हें यूँँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशाँ नहीं
Chakbast Brij Narayan
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न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-इसयाँ पर ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा कहा ग़ुंचा ने हँस कर वाह क्या नैरंग-ए-आलम है वजूद गुल जिसे समझे हैं सब है वो अदम मेरा कशाकश है उम्मीद-ओ-यास की ये ज़िंदगी क्या है इलाही ऐसी हस्ती से तो अच्छा था अदम मेरा दिल-ए-अहबाब में घर है शगुफ़्ता रहती है ख़ातिर यही जन्नत है मेरी और यही बाग़-ए-इरम मेरा मुझे अहबाब की पुर्सिश की ग़ैरत मार डालेगी क़यामत है अगर इफ़शा हुआ राज़-ए-अलम मेरा खड़ी थीं रास्ता रोके हुए लाखों तमन्नाएँ शहीद-ए-यास हूँ निकला है किस मुश्किल से दम मेरा ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा
Chakbast Brij Narayan
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फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना अजल क्या है ख़ुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना उरूस-ए-जाँ नया पैराहन-ए-हस्ती बदलती है फ़क़त तम्हीद आने की है दुनिया से गुज़र जाना मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मर्दाना खुलते हैं मुबारक बुज़दिलों को गर्दिश-ए-क़िस्मत से डर जाना वो तब्-ए-यास-परवर ने मुझे चश्म-ए-अक़ीदत दी कि शाम-ए-ग़म की तारीकी को भी नूर-ए-सहर जाना बहुत सौदा रहा वाइज़ तुझे नार-ए-जहन्नम का मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ऐ बे-ख़बर जाना करिश्मा ये भी है ऐ बे-ख़बर इफ़्लास-ए-क़ौमी का तलाश-ए-रिज़्क़ में अहल-ए-हुनर का दर-ब-दर जाना अजल की नींद में भी ख़्वाब-ए-हस्ती गर नज़र आया तो फिर बेकार है तंग आ के इस दुनिया से मर जाना वो सौदा ज़िंदगी का है कि ग़म इंसान सहता है नहीं तो है बहुत आसान इस जीने से मर जाना चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत में उसी ने बाग़बानी की कि जिस ने अपनी मेहनत को ही मेहनत का समर जाना सिधारी मंज़िल-ए-हस्ती से कुछ बे-ए'तिनाई से तन-ए-ख़ाकी को शायद रूह ने गर्द-ए-सफ़र जाना
Chakbast Brij Narayan
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अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता हज़ारों जान देते हैं बुतों की बे-वफ़ाई पर अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता ख़ुदा को भूल कर इंसान के दिल का ये आलम है ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता अगर दम भर भी मिट जाती ख़लिश ख़ार-ए-तमन्ना की दिल-ए-हसरत-तलब को अपनी हस्ती से गिला होता
Chakbast Brij Narayan
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