ghazalKuch Alfaaz

नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया हमें किसी से निभाना भी तो नहीं आया जला के रख लिया हाथों के साथ दामन तक तुम्हें चराग़ बुझाना भी तो नहीं आया नए मकान बनाए तो फ़ासलों की तरह हमें ये शहर बसाना भी तो नहीं आया वो पूछता था मिरी आँख भीगने का सबब मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया 'वसीम' देखना मुड़ मुड़ के वो उसी की तरफ़ किसी को छोड़ के जाना भी तो नहीं आया

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा

Tehzeeb Hafi

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अपने साए को इतना समझाने दे मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे एक नज़र में कई ज़माने देखे तो बूढ़ी आँखों की तस्वीर बनाने दे बाबा दुनिया जीत के मैं दिखला दूँगा अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे फिर तो ये ऊँचा ही होता जाएगा बचपन के हाथों में चाँद आ जाने दे फ़स्लें पक जाएँ तो खेत से बिछ्ड़ेंगी रोती आँख को प्यार कहाँ समझाने दे

Waseem Barelvi

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वो मुझ को क्या बताना चाहता है जो दुनिया से छुपाना चाहता है मुझे देखो कि मैं उस को ही चाहूँ जिसे सारा ज़माना चाहता है क़लम करना कहाँ है उस का मंशा वो मेरा सर झुकाना चाहता है शिकायत का धुआँ आँखों से दिल तक तअ'ल्लुक़ टूट जाना चाहता है तक़ाज़ा वक़्त का कुछ भी हो ये दिल वही क़िस्सा पुराना चाहता है

Waseem Barelvi

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अँधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर मिरे अंदर कोई बच्चा बिलक कर रोने लगता है मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की यही सब देखता है और 'कबीरा' रोने लगता है समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्किय्यत पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है ये दिल बच कर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है

Waseem Barelvi

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क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया उम्र-भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इस शिद्दत के साथ जिस बला का प्यार तुझ से बे-ख़बर मैं ने किया कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेच-ओ-ख़म ज़िंदगी-भर तो किताबों का सफ़र मैं ने किया किस को फ़ुर्सत थी कि बतलाता तुझे इतनी सी बात ख़ुद से क्या बरताव तुझ से छूट कर मैं ने किया चंद जज़्बाती से रिश्तों के बचाने को 'वसीम' कैसा कैसा जब्र अपने आप पर मैं ने किया

Waseem Barelvi

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सिर्फ़ तेरा नाम ले कर रह गया आज दीवाना बहुत कुछ कह गया क्या मिरी तक़दीर में मंज़िल नहीं फ़ासला क्यूँँ मुस्कुरा कर रह गया ज़िंदगी दुनिया में ऐसा अश्क थी जो ज़रा पलकों पे ठहरा बह गया और क्या था उस की पुर्सिश का जवाब अपने ही आँसू छुपा कर रह गया उस से पूछ ऐ कामयाब-ए-ज़िंदगी जिस का अफ़्साना अधूरा रह गया हाए क्या दीवानगी थी ऐ 'वसीम' जो न कहना चाहिए था कह गया

Waseem Barelvi

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