पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप उन से पूछा कि कब मिलेंगे आप बोले जब जाँ-ब-लब मिलेंगे आप दिल ये कह कर ख़बर को उस की चला मुझ को ज़िंदा न अब मिलेंगे आप अर्सा-ए-हश्र ईद-गाह हुआ सब से मिल लेंगे जब मिलेंगे आप वस्ल में भी जबीं पे होगी शिकन तोड़ने को ग़ज़ब मिलेंगे आप बे-ख़ुदों को तलाश से क्या काम हर जगह बे-तलब मिलेंगे आप छोड़ दी रुख़ पे ज़ुल्फ़ समझे हम छुप के एक आध शब मिलेंगे आप छेड़ मुतरिब तराना-ए-शब-ए-वस्ल साज़-ए-ऐश-ओ-तरब मिलेंगे आप यार जब मिल गया तो हम से 'जलाल' जो न मिलते थे सब मिलेंगे आप
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ग़ैर की बातों का आख़िर ऐतिबार आ ही गया मेरी जानिब से तेरे दिल में ग़ुबार आ ही गया जानता था खा रहा है बे-वफ़ा झूठी क़सम सादगी देखो कि फिर भी ऐतिबार आ ही गया पूछने वालों से तो मैं ने छुपाया दिल का राज़ फिर भी तेरा नाम लब पे एक बार आ ही गया तू न आया ओ वफ़ा दुश्मन तो क्या हम मर गए चंद दिन तड़पा किए आख़िर क़रार आ ही गया जी में था ऐ 'हश्र' उस से अब न बोलेंगे कभी बे-वफ़ा जब सामने आया तो प्यार आ ही गया
Agha Hashr Kashmiri
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इसी से होता है ज़ाहिर जो हाल दर्द का है सभी को कोई न कोई वबाल दर्द का है सहर सिसकते हुए आसमान से उतरी तो दिल ने जान लिया ये भी साल दर्द का है ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है अब इस के बा'द कोई राब्ता नहीं रखना ये बात तय हुई लेकिन सवाल दर्द का है ये दिल ये उजड़ी हुई चश्म-ए-नम ये तन्हाई हमारे पास तो जो भी है माल दर्द का है न तुम में सुख की कोई बात है न मुझ में है तुम्हारा और मेरा मिलना विसाल दर्द का है किसी ने पूछा के 'फ़रहत' बहुत हसीन हो तुम तो मुस्कुरा के कहा सब जमाल दर्द का है
Farhat Abbas Shah
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चलो हम ही पहल कर दें कि हम से बद-गुमाँ क्यूँँ हो कोई रिश्ता ज़रा सी ज़िद की ख़ातिर राएगाँ क्यूँँ हो मैं ज़िंदा हूँ तो इस ज़िंदा-ज़मीरी की बदौलत ही जो बोले तेरे लहजे में भला मेरी ज़बाँ क्यूँँ हो सवाल आख़िर ये इक दिन देखना हम ही उठाएँगे न समझे जो ज़मीं के ग़म वो अपना आसमाँ क्यूँँ हो हमारी गुफ़्तुगू की और भी सम्तें बहुत सी हैं किसी का दिल दुखाने ही को फिर अपनी ज़बाँ क्यूँँ हो बिखर कर रह गया हम सेायगी का ख़्वाब ही वर्ना दिए इस घर में रौशन हों तो उस घर में धुआँ क्यूँँ हो मोहब्बत आसमाँ को जब ज़मीं करने की ज़िद ठहरी तो फिर बुज़दिल उसूलों की शराफ़त दरमियाँ क्यूँँ हो उम्मीदें सारी दुनिया से 'वसीम' और ख़ुद में ऐसे ग़म किसी पे कुछ न ज़ाहिर हो तो कोई मेहरबाँ क्यूँँ हो
Waseem Barelvi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ऐ मुसव्विर जो मिरी तस्वीर खींच हसरत-आगीं ग़म-ज़दा दिल-गीर खींच जज़्ब भी कुछ ऐ तसव्वुर चाहिए ख़ुद खिंचे जिस शोख़ की तस्वीर खींच ऐ मोहब्बत दाग़-ए-दिल मुरझा न जाएँ इत्र इन फूलों का बे-ताख़ीर खींच आ बुतों में देख ज़ाहिद शान-ए-हक़ दैर में चल नारा-ए-तकबीर खींच एक साग़र पी के बूढ़ा हो जवान वो शराब ऐ मय-कदे के पैर खींच दिल न उस बुत का दुखे कहता है इश्क़ खींच जो नाला वो बे-तासीर खींच दिल इधर बेताब है तरकश उधर खींचता हूँ आह मैं तू तीर खींच कुछ तो काम आ हिज्र में ओ इज़्तिराब शोख़ी-ए-महबूब की तस्वीर खींच क़ैस से दश्त-ए-जुनूँ में कह 'जलाल' आगे आगे चल मिरे ज़ंजीर खींच
Jalal Lakhnavi
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वो दिल नसीब हुआ जिस को दाग़ भी न मिला मिला वो ग़म-कदा जिस में चराग़ भी न मिला गई थी कह के मैं लाती हूँ ज़ुल्फ़-ए-यार की बू फिरी तो बाद-ए-सबा का दिमाग़ भी न मिला चराग़ ले के इरादा था यार को ढूँडें शब-ए-फ़िराक़ थी कोई चराग़ भी न मिला ख़बर को यार की भेजा था गुम हुए ऐसे हवा से-ए-रफ़्ता का अब तक सुराग़ भी न मिला 'जलाल' बाग़-ए-जहाँ में वो अंदलीब हैं हम चमन को फूल मिले हम को दाग़ भी न मिला
Jalal Lakhnavi
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