ghazalKuch Alfaaz

वो दिल नसीब हुआ जिस को दाग़ भी न मिला मिला वो ग़म-कदा जिस में चराग़ भी न मिला गई थी कह के मैं लाती हूँ ज़ुल्फ़-ए-यार की बू फिरी तो बाद-ए-सबा का दिमाग़ भी न मिला चराग़ ले के इरादा था यार को ढूँडें शब-ए-फ़िराक़ थी कोई चराग़ भी न मिला ख़बर को यार की भेजा था गुम हुए ऐसे हवा से-ए-रफ़्ता का अब तक सुराग़ भी न मिला 'जलाल' बाग़-ए-जहाँ में वो अंदलीब हैं हम चमन को फूल मिले हम को दाग़ भी न मिला

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ऐ मुसव्विर जो मिरी तस्वीर खींच हसरत-आगीं ग़म-ज़दा दिल-गीर खींच जज़्ब भी कुछ ऐ तसव्वुर चाहिए ख़ुद खिंचे जिस शोख़ की तस्वीर खींच ऐ मोहब्बत दाग़-ए-दिल मुरझा न जाएँ इत्र इन फूलों का बे-ताख़ीर खींच आ बुतों में देख ज़ाहिद शान-ए-हक़ दैर में चल नारा-ए-तकबीर खींच एक साग़र पी के बूढ़ा हो जवान वो शराब ऐ मय-कदे के पैर खींच दिल न उस बुत का दुखे कहता है इश्क़ खींच जो नाला वो बे-तासीर खींच दिल इधर बेताब है तरकश उधर खींचता हूँ आह मैं तू तीर खींच कुछ तो काम आ हिज्र में ओ इज़्तिराब शोख़ी-ए-महबूब की तस्वीर खींच क़ैस से दश्त-ए-जुनूँ में कह 'जलाल' आगे आगे चल मिरे ज़ंजीर खींच

Jalal Lakhnavi

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पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप उन से पूछा कि कब मिलेंगे आप बोले जब जाँ-ब-लब मिलेंगे आप दिल ये कह कर ख़बर को उस की चला मुझ को ज़िंदा न अब मिलेंगे आप अर्सा-ए-हश्र ईद-गाह हुआ सब से मिल लेंगे जब मिलेंगे आप वस्ल में भी जबीं पे होगी शिकन तोड़ने को ग़ज़ब मिलेंगे आप बे-ख़ुदों को तलाश से क्या काम हर जगह बे-तलब मिलेंगे आप छोड़ दी रुख़ पे ज़ुल्फ़ समझे हम छुप के एक आध शब मिलेंगे आप छेड़ मुतरिब तराना-ए-शब-ए-वस्ल साज़-ए-ऐश-ओ-तरब मिलेंगे आप यार जब मिल गया तो हम से 'जलाल' जो न मिलते थे सब मिलेंगे आप

Jalal Lakhnavi

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