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ऐ मुसव्विर जो मिरी तस्वीर खींच हसरत-आगीं ग़म-ज़दा दिल-गीर खींच जज़्ब भी कुछ ऐ तसव्वुर चाहिए ख़ुद खिंचे जिस शोख़ की तस्वीर खींच ऐ मोहब्बत दाग़-ए-दिल मुरझा न जाएँ इत्र इन फूलों का बे-ताख़ीर खींच आ बुतों में देख ज़ाहिद शान-ए-हक़ दैर में चल नारा-ए-तकबीर खींच एक साग़र पी के बूढ़ा हो जवान वो शराब ऐ मय-कदे के पैर खींच दिल न उस बुत का दुखे कहता है इश्क़ खींच जो नाला वो बे-तासीर खींच दिल इधर बेताब है तरकश उधर खींचता हूँ आह मैं तू तीर खींच कुछ तो काम आ हिज्र में ओ इज़्तिराब शोख़ी-ए-महबूब की तस्वीर खींच क़ैस से दश्त-ए-जुनूँ में कह 'जलाल' आगे आगे चल मिरे ज़ंजीर खींच

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इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे

Ali Zaryoun

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बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले

Himanshi babra KATIB

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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मैं बरश छोड़ चुका आख़िरी तस्वीर के बा'द मुझ से कुछ बन नहीं पाया तिरी तस्वीर के बा'द मुश्तरक दोस्त भी छूटे हैं तुझे छोड़ने पर या'नी दीवार हटानी पड़ी तस्वीर के बा'द यार तस्वीर में तन्हा हूँ मगर लोग मिले कई तस्वीर से पहले कई तस्वीर के बा'द दूसरा इश्क़ मुयस्सर है मगर करता नहीं कौन देखेगा पुरानी नई तस्वीर के बा'द भेज देता हूँ मगर पहले बता दूँ तुझ को मुझ से मिलता नहीं कोई मिरी तस्वीर के बा'द ख़ुश्क दीवार में सीलन का सबब क्या होगा एक अदद ज़ंग लगी कील थी तस्वीर के बा'द

Umair Najmi

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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

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पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप उन से पूछा कि कब मिलेंगे आप बोले जब जाँ-ब-लब मिलेंगे आप दिल ये कह कर ख़बर को उस की चला मुझ को ज़िंदा न अब मिलेंगे आप अर्सा-ए-हश्र ईद-गाह हुआ सब से मिल लेंगे जब मिलेंगे आप वस्ल में भी जबीं पे होगी शिकन तोड़ने को ग़ज़ब मिलेंगे आप बे-ख़ुदों को तलाश से क्या काम हर जगह बे-तलब मिलेंगे आप छोड़ दी रुख़ पे ज़ुल्फ़ समझे हम छुप के एक आध शब मिलेंगे आप छेड़ मुतरिब तराना-ए-शब-ए-वस्ल साज़-ए-ऐश-ओ-तरब मिलेंगे आप यार जब मिल गया तो हम से 'जलाल' जो न मिलते थे सब मिलेंगे आप

Jalal Lakhnavi

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वो दिल नसीब हुआ जिस को दाग़ भी न मिला मिला वो ग़म-कदा जिस में चराग़ भी न मिला गई थी कह के मैं लाती हूँ ज़ुल्फ़-ए-यार की बू फिरी तो बाद-ए-सबा का दिमाग़ भी न मिला चराग़ ले के इरादा था यार को ढूँडें शब-ए-फ़िराक़ थी कोई चराग़ भी न मिला ख़बर को यार की भेजा था गुम हुए ऐसे हवा से-ए-रफ़्ता का अब तक सुराग़ भी न मिला 'जलाल' बाग़-ए-जहाँ में वो अंदलीब हैं हम चमन को फूल मिले हम को दाग़ भी न मिला

Jalal Lakhnavi

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