pa-ba-gil sab hain rihai ki kare tadbir kaun dast-basta shahr men khole miri zanjir kaun mera sar hazir hai lekin mera munsif dekh le kar raha hai meri fard-e-jurm ko tahrir kaun aaj darvazon pe dastak jaani pahchani si hai aaj mere naam laata hai miri taazir kaun koi maqtal ko gaya tha muddaton pahle magar hai dar-e-khema pe ab tak surat-e-tasvir kaun meri chadar to chhini thi shaam ki tanhai men be-ridai ko miri phir de gaya tashhir kaun sach jahan pa-basta mulzim ke katahre men mile us adalat men sunega adl ki tafsir kaun niind jab khvabon se pyari ho to aise ahd men khvab dekhe kaun aur khvabon ko de tabir kaun ret abhi pichhle makanon ki na vapas aai thi phir lab-e-sahil gharaunda kar gaya taamir kaun saare rishte hijraton men saath dete hain to phir shahr se jaate hue hota hai daman-gir kaun dushmanon ke saath mere dost bhi azad hain dekhna hai khinchta hai mujh pe pahla tiir kaun pa-ba-gil sab hain rihai ki kare tadbir kaun dast-basta shahr mein khole meri zanjir kaun mera sar hazir hai lekin mera munsif dekh le kar raha hai meri fard-e-jurm ko tahrir kaun aaj darwazon pe dastak jaani pahchani si hai aaj mere nam lata hai meri tazir kaun koi maqtal ko gaya tha muddaton pahle magar hai dar-e-khema pe ab tak surat-e-taswir kaun meri chadar to chhini thi sham ki tanhai mein be-ridai ko meri phir de gaya tashhir kaun sach jahan pa-basta mulzim ke katahre mein mile us adalat mein sunega adl ki tafsir kaun nind jab khwabon se pyari ho to aise ahd mein khwab dekhe kaun aur khwabon ko de tabir kaun ret abhi pichhle makanon ki na wapas aai thi phir lab-e-sahil gharaunda kar gaya tamir kaun sare rishte hijraton mein sath dete hain to phir shahr se jate hue hota hai daman-gir kaun dushmanon ke sath mere dost bhi aazad hain dekhna hai khinchta hai mujh pe pahla tir kaun
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ इक ज़रा शे'र कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात जाने क्यूँँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँँ हर बात सुनूँ एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ
Parveen Shakir
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बजा कि आँख में नींदों के सिलसिले भी नहीं शिकस्त-ए-ख़्वाब के अब मुझ में हौसले भी नहीं नहीं नहीं ये ख़बर दुश्मनों ने दी होगी वो आए आ के चले भी गए मिले भी नहीं ये कौन लोग अँधेरों की बात करते हैं अभी तो चाँद तिरी याद के ढले भी नहीं अभी से मेरे रफ़ूगर के हाथ थकने लगे अभी तो चाक मिरे ज़ख़्म के सिले भी नहीं ख़फ़ा अगरचे हमेशा हुए मगर अब के वो बरहमी है कि हम से उन्हें गिले भी नहीं
Parveen Shakir
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गवाही कैसे टूटती मुआ'मला ख़ुदा का था मिरा और उस का राब्ता तो हाथ और दुआ का था गुलाब क़ीमत-ए-शगुफ़्त शाम तक चुका सके अदा वो धूप को हुआ जो क़र्ज़ भी सबा का था बिखर गया है फूल तो हमीं से पूछ-गछ हुई हिसाब बाग़बाँ से है किया-धरा हवा का था लहू-चशीदा हाथ उस ने चूम कर दिखा दिया जज़ा वहाँ मिली जहाँ कि मरहला सज़ा का था जो बारिशों से क़ब्ल अपना रिज़्क़ घर में भर चुका वो शहर-ए-मोर से न था प दूरबीं बला का था
Parveen Shakir
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चराग़-ए-राह बुझा क्या कि रहनुमा भी गया हवा के साथ मुसाफ़िर का नक़्श-ए-पा भी गया मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई वो शख़्स आ के मिरे शहर से चला भी गया बहुत अज़ीज़ सही उस को मेरी दिलदारी मगर ये है कि कभी दिल मिरा दुखा भी गया अब उन दरीचों पे गहरे दबीज़ पर्दे हैं वो ताँक-झाँक का मा'सूम सिलसिला भी गया सब आए मेरी अयादत को वो भी आया था जो सब गए तो मिरा दर्द-आश्ना भी गया ये ग़ुर्बतें मिरी आँखों में कैसी उतरी हैं कि ख़्वाब भी मिरे रुख़्सत हैं रतजगा भी गया
Parveen Shakir
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इक हुनर था कमाल था क्या था मुझ में तेरा जमाल था क्या था तेरे जाने पे अब के कुछ न कहा दिल में डर था मलाल था क्या था बर्क़ ने मुझ को कर दिया रौशन तेरा अक्स-ए-जलाल था क्या था हम तक आया तू बहर-ए-लुत्फ़-ओ-करम तेरा वक़्त-ए-ज़वाल था क्या था जिस ने तह से मुझे उछाल दिया डूबने का ख़याल था क्या था जिस पे दिल सारे अहद भूल गया भूलने का सवाल था क्या था तितलियाँ थे हम और क़ज़ा के पास सुर्ख़ फूलों का जाल था क्या था
Parveen Shakir
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