پلا مد مست اے ساقی کہ منج عادت ہے پینے کا ہو سر خوش دور یکدھرتے کروں گا زنگ سینے کا بچن میری زباں کے آج تارے ہو نہ کیوں جھمکیں کہ ہے یوں چرخ زنگاری ورق میرے سفینے کا زمانے آج کے میں وو نگینہ بے بدل ہوں جو سلیماں باج قیمت کوئی نہ دیوے منج نگینے کا میرا جیو پیو ہے اس جیوں کوں بسروں کیوں کدھی بسروں تو مرجاؤں نہ پاوں ذوق جینے کا پدک ہے عین میرا نظم چندر سور کے گل کا جڑت ہے عین میرا شعر خوباں کے زرینے کا جکوئی عرفان کے صاحب سچے ہیں سوکتے ہیں یوں کہ یاں تو کوئی نئیں دستا غواصیؔ کے قرینے کا
Related Ghazal
दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की का'बा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे 'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे
Behzad Lakhnavi
32 likes
जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था
Abbas Tabish
19 likes
भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा जिसे तेरी आरज़ू नहीं तू उसे मिला तो बुरा लगेगा ये ऐसा रस्ता है जिस पे हर कोई बारहा लड़खड़ा रहा है मैं पहली ठोकर के बा'द ही गर सँभल गया तो बुरा लगेगा मैं ख़ुश हूँ उस के निकालने पर और इतना आगे निकल चुका हूँ के अब अचानक से उस ने वापस बुला लिया तो बुरा लगेगा ये आख़िरी कंपकंपाता जुमला कि इस तअ'ल्लुक़ को ख़त्म कर दो बड़े जतन से कहा है उस ने नहीं किया तो बुरा लगेगा न जाने कितने ग़मों को पीने के बा'द ताबिश चढ़ी उदासी किसी ने ऐसे में आ के हम को हँसा दिया तो बुरा लगेगा
Zubair Ali Tabish
28 likes
सच बताएँ तो शर्म आती है और छुपाएँ तो शर्म आती है हम पे एहसान हैं उदासी के मुस्कुराएँ तो शर्म आती है हार की ऐसी आदतें हैं हमें जीत जाएँ तो शर्म आती है उस के आगे ही उस का बख़्शा हुआ सर उठाएँ तो शर्म आती है ऐश औकात से ज़्यादा की अब कमाएँ तो शर्म आती है धमकियाँ ख़ुद-कुशी की देते हैं कर न पाएँ तो शर्म आती है
Varun Anand
36 likes
जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
268 likes
Similar Writers
Our suggestions based on غواصی بیدری.
Similar Moods
More moods that pair well with غواصی بیدری's ghazal.







