rahiye ab aisi jagah chal kar jahan koi na ho ham-sukhan koi na ho aur ham-zaban koi na ho to go and live in such a place where no one else should be no one there to share one's thoughts no soul for company be-dar-o-divar sa ik ghar banaya chahiye koi ham-saya na ho aur pasban koi na ho one should build an open house, no walls nor doors to see no neighbours to surround nor guards for security padiye gar bimar to koi na ho timardar aur agar mar jaiye to nauha-khvan koi na ho if perchance one were to ail no one to remedy and if one were to die no one to weep for thee rahiye ab aisi jagah chal kar jahan koi na ho ham-sukhan koi na ho aur ham-zaban koi na ho to go and live in such a place where no one else should be no one there to share one's thoughts no soul for company be-dar-o-diwar sa ek ghar banaya chahiye koi ham-saya na ho aur pasban koi na ho one should build an open house, no walls nor doors to see no neighbours to surround nor guards for security padiye gar bimar to koi na ho timardar aur agar mar jaiye to nauha-khwan koi na ho if perchance one were to ail no one to remedy and if one were to die no one to weep for thee
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम
Mirza Ghalib
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मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की क़िस्मत खुली तिरे क़द-ओ-रुख़ से ज़ुहूर की इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की वाइ'ज़ न तुम पियो न किसी को पिला सको क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-तहूर की लड़ता है मुझ से हश्र में क़ातिल कि क्यूँँ उठा गोया अभी सुनी नहीं आवाज़ सूर की आमद बहार की है जो बुलबुल है नग़्मा-संज उड़ती सी इक ख़बर है ज़बानी तुयूर की गो वाँ नहीं प वाँ के निकाले हुए तो हैं का'बे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस क़दर की जिस से बात उस ने शिकायत ज़रूर की 'ग़ालिब' गर इस सफ़र में मुझे साथ ले चलें हज का सवाब नज़्र करूँँगा हुज़ूर की
Mirza Ghalib
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कब वो सुनता है कहानी मेरी और फिर वो भी ज़बानी मेरी ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी क्या बयाँ कर के मिरा रोएँगे यार मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी हूँ ज़-ख़ुद रफ़्ता-ए-बैदा-ए-ख़याल भूल जाना है निशानी मेरी मुतक़ाबिल है मुक़ाबिल मेरा रुक गया देख रवानी मेरी क़द्र-ए-संग-ए-सर-ए-रह रखता हूँ सख़्त अर्ज़ां है गिरानी मेरी गर्द-बाद-ए-रह-ए-बेताबी हूँ सरसर-ए-शौक़ है बानी मेरी दहन उस का जो न मालूम हुआ खुल गई हेच मदानी मेरी कर दिया ज़ोफ़ ने आजिज़ 'ग़ालिब' नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी
Mirza Ghalib
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हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन वर्ना हम छेड़ेंगे रख कर उज़्र-ए-मस्ती एक दिन ग़र्रा-ए-औज-ए-बिना-ए-आलम-ए-इमकाँ न हो इस बुलंदी के नसीबों में है पस्ती एक दिन क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन नग़्मा-हा-ए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिए बे-सदा हो जाएगा ये साज़-ए-हस्ती एक दिन धौल-धप्पा उस सरापा-नाज़ का शेवा नहीं हम ही कर बैठे थे 'ग़ालिब' पेश-दस्ती एक दिन
Mirza Ghalib
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न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा हबाब-ए-मौजा-ए-रफ़्तार है नक़्श-ए-क़दम मेरा मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है कि मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा रह-ए-ख़्वाबीदा थी गर्दन-कश-ए-यक-दर्स-ए-आगाही ज़मीं को सैली-ए-उस्ताद है नक़्श-ए-क़दम मेरा सुराग़-आवारा-ए-अर्ज़-ए-दो-आलम शोर-ए-महशर हूँ पर-अफ़्शाँ है ग़ुबार आँ सू-ए-सहरा-ए-अदम मेरा हवा-ए-सुब्ह यक-आलम गरेबाँ चाकी-ए-गुल है दहान-ए-ज़ख़्म पैदा कर अगर खाता है ग़म मेरा न हो वहशत-कश-ए-दर्स-ए-सराब-ए-सत्र-ए-आगाही मैं गर्द-ए-राह हूँ बे-मुद्दआ है पेच-ओ-ख़म मेरा 'असद' वहशत-परस्त-ए-गोशा-ए-तन्हाई-ए-दिल है ब-रंग-ए-मौज-ए-मय ख़म्याज़ा-ए-साग़र है रम मेरा
Mirza Ghalib
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