ghazalKuch Alfaaz

सामने तेरे हूँ घबराया हुआ बे-ज़बाँ होने पर शरमाया हुआ लाख अब मंज़र हो धुँदलाया हुआ याद है मुझ को नज़र आया हुआ ये भी कहना था बता कर रास्ता मैं वही हूँ तेरा भटकाया हुआ मैं कि इक आसेब इक बे-चैन रूह बे-वुज़ू हाथों का दफ़नाया हुआ आ गया फिर मशवरा देने मुझे ख़ेमा-ए-दुश्मन का समझाया हुआ फिर वो मंज़िल लुत्फ़ क्या देती मुझे मैं वहाँ पहुँचा था झुँझलाया हुआ तेरी गलियों से गुज़र आसाँ नहीं आज भी चलता हूँ घबराया हुआ कुछ नया करने का फिर मतलब ही क्या जब तमाशाई है उकताया हुआ कम से कम इस का तो रखता वो लिहाज़ मैं हूँ इक आवाज़ पर आया हुआ मुझ को आसानी से पा सकता है कौन मैं हूँ तेरे दर का ठुकराया हुआ

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी

Shariq Kaifi

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ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है आँख खुल जाए तो मुसीबत है जिस्म आया किसी के हिस्से में दिल किसी और की अमानत है जान देने का वक़्त आ ही गया इस तमाशे के बा'द फ़ुर्सत है उम्र भर जिस के मश्वरों पे चले वो परेशान है तो हैरत है अब सँवरने का वक़्त उस को नहीं जब हमें देखने की फ़ुर्सत है उस पे उतने ही रंग खुलते हैं जिस की आँखों में जितनी हैरत है

Shariq Kaifi

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कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए कोई मेरा भी बुरा चाहने वाला हो जाए इसी मजबूरी में ये भीड़ इकट्ठा है यहाँ जो तिरे साथ नहीं आए वो तन्हा हो जाए शुक्र उस का अदा करने का ख़याल आए किसे अब्र जब इतना घना हो कि अँधेरा हो जाए हाँ नहीं चाहिए उस दर्जा मोहब्बत तेरी कि मिरा सच भी तिरे झूट का हिस्सा हो जाए बंद आँखों ने सराबों से बचाया है मुझे आँख वाला हो तो इस खेल में अंधा हो जाए मैं भी क़तरा हूँ तिरी बात समझ सकता हूँ ये कि मिट जाने के डर से कोई दरिया हो जाए बस इसी बात पे आईनों से बिगड़ी मेरी चाहता था मिरा अपना कोई चेहरा हो जाए बज़्म-ए-याराँ में यही रंग तो देते हैं मज़ा कोई रोए तो हँसी से कोई दोहरा हो जाए

Shariq Kaifi

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सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है सोते में भी जैसे कोई सिसकी लेता है घर में तो इस माहौल का मैं आदी हूँ लेकिन बाज़ारों की वीरानी से दम घुटता है मुद्दत से मैं सोच रहा था अब समझा हूँ जेब और आँख के ख़ाली-पन में क्या रिश्ता है इतने लोग मुझे रुख़्सत करने आए हैं घर वापस जाना भी तमाशा सा लगता है लोग तो अपनी जानिब से कुछ जोड़ ही लेंगे इतनी अधूरी बातें हैं वो क्यूँँ करता है अपनी क्या इन रस्तों के बारे में सोचूँ उन का सफ़र तो मेरी उम्र से भी लम्बा है उस की आँखों से ओझल मत होना 'शारिक़' पीछा करने वाला बहुत तन्हा होता है

Shariq Kaifi

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कुछ क़दम और मुझे जिस्म को ढोना है यहाँ साथ लाया हूँ उसी को जिसे खोना है यहाँ भीड़ छट जाएगी पल में ये ख़बर उड़ते ही अब कोई और तमाशा नहीं होना है यहाँ ये भँवर कौन सा मोती मुझे दे सकता है बात ये है कि मुझे ख़ुद को डुबोना है यहाँ क्या मिला दश्त में आ कर तिरे दीवाने को घर के जैसा ही अगर जागना सोना है यहाँ कुछ भी हो जाए न मानूँगा मगर जिस्म की बात आज मुजरिम तो किसी और को होना है यहाँ यूँँ भी दरकार है मुझ को किसी बीनाई का लम्स अब किसी और का होना मिरा होना है यहाँ अश्क पलकों पे सजा लूँ मैं अभी से 'शारिक़' शब है बाक़ी तो तिरा ज़िक्र भी होना है यहाँ

Shariq Kaifi

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