sahr-e-gah-e-id men daur-e-subu tha par apne jaam men tujh bin lahu tha ghhalat tha aap se ghhafil guzarna na samjhe ham ki is qalib men tu tha chaman ki vaz' ne ham ko kya daaghh ki har ghhuncha dil-e-pur-arzu tha gulo-aina kya khurshid-o-mah kya jidhar dekha tidhar tera hi ru tha karoge yaad baten to kahoge ki koi rafta-e-bisyar-go tha jahan par hai fasane se hamare dimaghh-e-ishq ham ko bhi kabhu tha magar divana tha gul bhi kisu ka ki pairahan men so jaaga rafu tha kahin kya baal tere khul gae the ki jhonka baav ka kuchh mushkbu tha na dekha 'mir' avara ko lekin ghhubar ik na-tavan sa ku-ba-ku tha sahr-e-gah-e-id mein daur-e-subu tha par apne jam mein tujh bin lahu tha ghalat tha aap se ghafil guzarna na samjhe hum ki is qalib mein tu tha chaman ki waz' ne hum ko kya dagh ki har ghuncha dil-e-pur-arzu tha gulo-aina kya khurshid-o-mah kya jidhar dekha tidhar tera hi ru tha karoge yaad baaten to kahoge ki koi rafta-e-bisyar-go tha jahan par hai fasane se hamare dimagh-e-ishq hum ko bhi kabhu tha magar diwana tha gul bhi kisu ka ki pairahan mein so jaga rafu tha kahin kya baal tere khul gae the ki jhonka baw ka kuchh mushkbu tha na dekha 'mir' aawara ko lekin ghubar ek na-tawan sa ku-ba-ku tha
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
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कई दिन सुलूक विदाअ'' का मिरे दर पय दिल ज़ार था कभू दर्द था कभू दाग़ था कभू ज़ख़्म था कभू वार था दम-ए-सुब्ह बज़्म-ए-ख़ुश जहाँ शब-ए-ग़म से कम न थी मेहरबाँ कि चराग़ था सो तू दूद था जो पतंग था सो ग़ुबार था दिल ख़स्ता-लोहू जो हो गया तो भला हुआ कि कहाँ तलक कभू सोज़-ए-सीना से दाग़ था कभू दर्द-ओ-ग़म से फ़िगार था दिल-ए-मुज़्तरिब से गुज़र गई शब-ए-वस्ल अपनी ही फ़िक्र में न दिमाग़ था न फ़राग़ था न शकेब था न क़रार था जो निगाह की भी पलक उठा तो हमारे दिल से लहू बहा कि वहीं वो नावक-ए-बे-ख़ता कसो के कलेजे के पार था ये तुम्हारी इन दिनों दोस्ताँ मिज़ा जिस के ग़म में है ख़ूँ-चकाँ वही आफ़त-ए-दिल-ए-आशिक़ाँ कसो वक़्त हम से भी यार था नहीं ताज़ा-दिल की शिकस्तगी यही दर्द था यही ख़स्तगी उसे जब से ज़ौक़-ए-शिकार था उसे ज़ख़्म से सरोकार था कभू जाएगी जो उधर सबा तो ये कहियो उस से कि बे-वफ़ा मगर एक 'मीर' शिकस्ता-पा तिरे बाग़-ए-ताज़ा में ख़ार था
Meer Taqi Meer
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बू कि हो सू-ए-बाग़ निकले है बाव से इक दिमाग़ निकले है है जो अंधेर शहर में ख़ुर्शीद दिन को ले कर चराग़ निकले है चोब-कारी ही से रहेगा शैख़ अब तो ले कर चुमाग़ निकले है दे है जुम्बिश जो वाँ की ख़ाक को बाव जिगर दाग़ दाग़ निकले है हर सहर हादिसा मिरी ख़ातिर भर के ख़ूँ का अयाग़ निकले है उस गली की ज़मीन-ए-तफ़्ता से दिल-जलों का सुराग़ निकले है शायद उस ज़ुल्फ़ से लगी है 'मीर' बाव में इक दिमाग़ निकले है
Meer Taqi Meer
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कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से पर्दा उठा तो लड़ियाँ आँखें हमारी हम से सूरत-गर-ए-अजल का क्या हाथ था कहे तो खींची वो तेग़-ए-अबरू फ़ौलाद के क़लम से सोज़िश गई न दिल की रोने से रोज़-ओ-शब के जलता हूँ और दरिया बहते हैं चश्म-ए-नम से ताअ'त का वक़्त गुज़रा मस्ती में आब रज़ की अब चश्म-दाश्त उस के याँ है फ़क़त करम से कुढि़ए न रोइए तो औक़ात क्यूँँके गुज़रे रहता है मश्ग़ला सा बार-ए-ग़म-ओ-अलम से मशहूर है समाजत मेरी कि तेग़ बरसी पर मैं न सर उठाया हरगिज़ तिरे क़दम से बात एहतियात से कर ज़ाएअ'' न कर नफ़स को बालीदगी-ए-दिल है मानिंद-ए-शीशा दम से क्या क्या तअब उठाए क्या क्या अज़ाब देखे तब दिल हुआ है उतना ख़ूगर तिरे सितम से हस्ती में हम ने आ कर आसूदगी न देखी खुलतीं न काश आँखें ख़्वाब ख़ुश अदम से पामाल कर के हम को पछताओगे बहुत तुम कमयाब हैं जहाँ में सर देने वाले हम से दिल दो हो 'मीर' साहब उस बद-मआ'श को तुम ख़ातिर तो जम्अ'' कर लो टक क़ौल से क़सम से
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