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sanvar nok-palak abruon men kham kar de gire pade hue lafzon ko mohtaram kar de ghhurur us pe bahut sajta hai magar kah do isi men us ka bhala hai ghhurur kam kar de yahan libas ki qimat hai aadmi ki nahin mujhe gilas bade de sharab kam kar de chamakne vaali hai tahrir meri qismat ki koi charaghh ki lau ko zara sa kam kar de kisi ne chuum ke ankhon ko ye dua di thi zamin teri khuda motiyon se nam kar de sanwar nok-palak abruon mein kham kar de gire pade hue lafzon ko mohtaram kar de ghurur us pe bahut sajta hai magar kah do isi mein us ka bhala hai ghurur kam kar de yahan libas ki qimat hai aadmi ki nahin mujhe gilas bade de sharab kam kar de chamakne wali hai tahrir meri qismat ki koi charagh ki lau ko zara sa kam kar de kisi ne chum ke aankhon ko ye dua di thi zamin teri khuda motiyon se nam kar de

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली सह में सह में हाथों ने इक किताब फिर खोली दाएरे अँधेरों के रौशनी के पोरों ने कोट के बटन खोले टाई की गिरह खोली शीशे की सिलाई में काले भूत का चढ़ना बाम काठ का घोड़ा नीम काँच की गोली बर्फ़ में दबा मक्खन मौत रेल और रिक्शा ज़िंदगी ख़ुशी रिक्शा रेल मोटरें डोली इक किताब चाँद और पेड़ सब के काले कॉलर पर ज़ेहन टेप की गर्दिश मुँह में तोतों की बोली वो नहीं मिली हम को हुक बटन सरकती ज़ीन ज़िप के दाँत खुलते ही आँख से गिरी चोली

Bashir Badr

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वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है कहाँ से आई ये ख़ुशबू ये घर की ख़ुशबू है इस अजनबी के अँधेरे में कौन आया है महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है उसे किसी की मोहब्बत का ए'तिबार नहीं उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है तमाम उम्र मिरा दिल उसी धुएँ में घुटा वो इक चराग़ था मैं ने उसे बुझाया है

Bashir Badr

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मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे ज़रा देख चाँद की पत्तियों ने बिखर बिखर के तमाम शब तिरा नाम लिक्खा है रेत पर कोई लहर आ के मिटा न दे मैं उदासियाँ न सजा सकूँ कभी जिस्म-ओ-जाँ के मज़ार पर न दिए जलें मिरी आँख में मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे मिरे साथ चलने के शौक़ में बड़ी धूप सर पे उठाएगा तिरा नाक नक़्शा है मोम का कहीं ग़म की आग घुला न दे मैं ग़ज़ल की शबनमी आँख से ये दुखों के फूल चुना करूँँ मिरी सल्तनत मिरा फ़न रहे मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे

Bashir Badr

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चमक रही है परों में उड़ान की ख़ुशबू बुला रही है बहुत आसमान की ख़ुशबू भटक रही है पुरानी दुलाइयाँ ओढ़े हवेलियों में मिरे ख़ानदान की ख़ुशबू सुना के कोई कहानी हमें सुलाती थी दु'आओं जैसी बड़े पान-दान की ख़ुशबू दबा था फूल कोई मेज़-पोश के नीचे गरज रही थी बहुत पेचवान की ख़ुशबू अजब वक़ार था सूखे सुनहरे बालों में उदासियों की चमक ज़र्द लॉन की ख़ुशबू वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुशबू ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है बदन से आने लगी ज़ाफ़रान की ख़ुशबू इमारतों की बुलंदी पे कोई मौसम क्या कहाँ से आ गई कच्चे मकान की ख़ुशबू गुलों पे लिखती हुई ला-इलाहा-इल्लल्लाह पहाड़ियों से उतरती अज़ान की ख़ुशबू

Bashir Badr

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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

Bashir Badr

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