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शाम ढले मैं घर रौशन भी करता था कितना कुछ तो मैं बेमन भी करता था दुनिया मुझ सेे सिर्फ़ मोहब्बत करती है वो दीवाना पागलपन भी करता था तुम जो कहते थे ना इक दिन छू लोगे छू लेते ना मेरा मन भी करता था मेरे सिरहाने वो घुँघरू गुम-सुम है उस के पैरों में छनछन भी करता था उस के हाथों में बस हम ही जँचते थे दावा सोने का कंगन भी करता था

Vishal Bagh24 Likes

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ख़बर सुन कर वो ये इतरा रहा है मुझे उस का बिछोड़ा खा रहा है मेरे सय्याद को कोई बुला दो मेरे पिंजरे को तोड़ा जा रहा है निकलना है हमें कब से सफ़र पर मगर ये जिस्म आड़े आ रहा है मैं उस को याद भी करना न चाहूँ वो आ कर ख़्वाब में उकसा रहा है चलो उस को अज़ीयत से निकालें सुना है अब भी वो पछता रहा है

Vishal Bagh

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सुनने में आया है मेरा चर्चा नइँ था मुझ को जितना लगता था मैं उतना नइँ था उस को अच्छे लगते थे सब छैल छबीले हम जैसों को उस सेे कोई ख़तरा नइँ था सादा दिल थे सो हम अपने ही दुश्मन थे वो भी अच्छा लगता था जो अच्छा नइँ था शर्मीले साजन की सब बेशर्मी देखी सब कुछ सोचा करता था वो कहता नइँ था अच्छी सूरत कितनी अच्छी हो सकती थी लेकिन तब तक मैं ने उस को देखा नइँ था

Vishal Bagh

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मेरे जिया की मेरे पिया को तुम्हीं सुनाओ निगोड़ी अँखियों ये चुप का पत्थर पड़ा है दिल पर इसे हटाओ निगोड़ी अँखियों बरसती जाओ बरसती जाओ बरसती जाओ बरसती जाओ कि दिल से सब कुछ बहा के उस की जगह बनाओ निगोड़ी अँखियों उसी को देखो उसी को देखो उसी को देखो उसी को देखो कि देखने का है काम तुम को सो काम आओ निगोड़ी अँखियों मुआँ ये दर्पण मुआँ ये दर्पण मुआँ ये दर्पण मुआँ ये दर्पण मुझे इसी की नज़र लगी है इसे हटाओ निगोड़ी अँखियों वो उठ गया है वो चल दिया है वो जा रहा है चला न जाए उसे मनाओ उसे मनाओ उसे मनाओ निगोड़ी अँखियों

Vishal Bagh

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वो जो लिखा है सब किताबों में वो ही शामिल नहीं निसाबों में उस की तासीर ऐसे काटी है हम ने घोला उसे शराबों में ये मेरी हिचकियाँ बताती हैं मैं बक़ाया हूँ कुछ हिसाबों में तो कोई तजरबा ही कर लें क्या कुछ नहीं मिल रहा किताबों में हम उसे यूँ ही मिल गए होते उस ने ढूँढ़ा नहीं ख़राबों में आओ और आ के फिर बिछड़ जाओ कुछ इज़ाफ़ा करो 'अज़ाबों में

Vishal Bagh

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अपनी मर्ज़ी से कुछ चुनूँगा मैं हर अदा पर नहीं मरूँगा मैं वो अगर ऐसे देख ले मुझ को उस को अच्छा नहीं लगूँगा मैं बाग़ में दिल नहीं लगा अब के अगले मौसम नहीं खिलूँगा मैं उस सेे आगे नहीं निकलना पर उस के पीछे नहीं चलूँगा मैं कह गए थे वो याद रक्खेंगे याद ही तो नहीं रहूँगा मैं

Vishal Bagh

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