ghazalKuch Alfaaz

सियाने थे मगर इतने नहीं हम ख़मोशी की ज़बाँ समझे नहीं हम अना की बात अब सुनना पड़ेगी वो क्या सोचेगा जो रूठे नहीं हम अधूरी लग रही है जीत उस को उसे हारे हुए लगते नहीं हम हमें तो रोक लो उठने से पहले पलट कर देखने वाले नहीं हम बिछड़ने का तिरे सदमा तो होगा मगर इस ख़ौफ़ को जीते नहीं हम तिरे रहते तो क्या होते किसी के तुझे खो कर भी दुनिया के नहीं हम ये मंज़िल ख़्वाब ही रहती हमेशा अगर घर लौट कर आते नहीं हम कभी सोचे तो इस पहलू से कोई किसी की बात क्यूँँ सुनते नहीं हम अभी तक मश्वरों पर जी रहे हैं किसी सूरत बड़े होते नहीं हम

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तिरी तरफ़ से तो हाँ मान कर ही चलना है कि सारा खेल इस उम्मीद पर ही चलना है क़दम ठहर ही गए हैं तिरी गली में तो फिर यहाँ से कोई दुआ माँग कर ही चलना है रहे हो साथ तो कुछ वक़्त और दे दो हमें यहाँ से लौट के बस अब तो घर ही चलना है मुख़ालिफ़त पे हवाओं की क्यूँ परेशाँ हों तुम्हारी सम्त अगर उम्‍र भर ही चलना है कोई उमीद नहीं खिड़कियों को बंद करो कि अब तो दश्त-ए-बला का सफ़र ही चलना है ज़रा सा क़ुर्ब मुयस्सर तो आए उस का मुझे कि उस के बा'द ज़बाँ का हुनर ही चलना है

Shariq Kaifi

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गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ अँधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है हमारे इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है

Shariq Kaifi

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लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी

Shariq Kaifi

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ख़्वाब वैसे तो इक इनायत है आँख खुल जाए तो मुसीबत है जिस्म आया किसी के हिस्से में दिल किसी और की अमानत है जान देने का वक़्त आ ही गया इस तमाशे के बा'द फ़ुर्सत है उम्र भर जिस के मश्वरों पे चले वो परेशान है तो हैरत है अब सँवरने का वक़्त उस को नहीं जब हमें देखने की फ़ुर्सत है उस पे उतने ही रंग खुलते हैं जिस की आँखों में जितनी हैरत है

Shariq Kaifi

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इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं अब उसे ऐसे ही समझाता हूँ मैं कुछ हवा कुछ दिल धड़कने की सदा शोर में कुछ सुन नहीं पाता हूँ मैं बिन कहे आऊँगा जब भी आऊँगा मुंतज़िर आँखों से घबराता हूँ मैं याद आती है तिरी संजीदगी और फिर हँसता चला जाता हूँ मैं फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ आज भी उस का ही कहलाता हूँ मैं छुप रहा हूँ आइने की आँख से थोड़ा थोड़ा रोज़ धुँदलाता हूँ मैं अपनी सारी शान खो देता है ज़ख़्म जब दवा करता नज़र आता हूँ मैं सच तो ये है मुस्तरद कर के उसे इक तरह से ख़ुद को झुटलाता हूँ मैं आज उस पर भी भटकना पड़ गया रोज़ जिस रस्ते से घर आता हूँ मैं

Shariq Kaifi

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