ghazalKuch Alfaaz

सूरत से इस की बेहतर सूरत नहीं है कोई दीदार-ए-यार सी भी दौलत नहीं है कोई आँखों को खोल अगर तू दीदार का है भूका चौदह तबक़ से बाहर नेमत नहीं है कोई साबित तिरे दहन को क्या मंतिक़ी करेंगे ऐसी दलील ऐसी हुज्जत नहीं है कोई ये क्या समझ के कड़वे होते हैं आप हम से पी जाएगा किसी को शर्बत नहीं है कोई मैं ने कहा कभी तो तशरीफ़ लाओ बोले म'अज़ूर रखिए वक़्त-ए-फ़ुर्सत नहीं है कोई हम क्या कहें किसी से क्या है तरीक़ अपना मज़हब नहीं है कोई मिल्लत नहीं है कोई दिल ले के जान के भी साइल जो हो तो हाज़िर हाज़िर जो कुछ है उस में हुज्जत नहीं है कोई हम शाइरों का हल्क़ा हल्क़ा है आरिफ़ों का ना-आश्ना-ए-मअ'नी सूरत नहीं है कोई दीवानों से है अपने ये क़ौल उस परी का ख़ाकी ओ आतिशी से निस्बत नहीं है कोई हज़्दा हज़ार आलम दम-भर रहा है तेरा तुझ को न चाहे ऐसी ख़िल्क़त नहीं है कोई नाज़ाँ न हुस्न पर हो मेहमाँ है चार दिन का बे-ए'तिबार ऐसी दौलत नहीं है कोई जाँ से अज़ीज़ दिल को रखता हूँ आदमी हूँ क्यूँँ-कर कहूँ मैं मुझ को हसरत नहीं है कोई यूँँ बद कहा करो तुम यूँँ माल कुछ न समझो हम सा भी ख़ैर-ख़्वाह-ए-दौलत नहीं है कोई मैं पाँच वक़्त सज्दा करता हूँ इस सनम को मुझ को भी ऐसी-वैसी ख़िदमत नहीं है कोई मा-ओ-शुमा कह-ओ-मह करता है ज़िक्र तेरा इस दास्ताँ से ख़ाली सोहबत नहीं है कोई शहर-ए-बुताँ है 'आतिश' अल्लाह को करो याद किस को पुकारते हो हज़रत नहीं है कोई

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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वही चितवन की ख़ूँ-ख़्वारी जो आगे थी सो अब भी है तिरी आँखों की बीमारी जो आगे थी सो अब भी है वही नश्व-ओ-नुमा-ए-सब्ज़ा है गोर-ए-ग़रीबाँ पर हवा-ए-चर्ख़-ए-ज़ंगारी जो आगे थी सो अब भी है तअल्लुक़ है वही ता-हाल उन ज़ुल्फ़ों के सौदे से सलासिल की गिरफ़्तारी जो आगे थी सो अब भी है वही सर का पटकना है वही रोना है दिन भर का वही रातों की बेदारी जो आगे थी सो अब भी है रिवाज-ए-इश्क़ के आईं वही हैं किश्वर-ए-दिल में रह-ओ-रस्म-ए-वफ़ा जारी जो आगे थी सो अब भी है वही जी का जलाना है पकाना है वही दिल का वो उस की गर्म-बाज़ारी जो आगे थी सो अब भी है नियाज़-ए-ख़ादिमाना है वही फ़ज़्ल-ए-इलाही से बुतों की नाज़-बरदारी जो आगे थी सो अब भी है फ़िराक़-ए-यार में जिस तरह से मरता था मरता हूँ वो रूह ओ तन की बे-ज़ारी जो आगे थी सो अब भी है वही साैदा-ए-काकुल का है आलम जो कि साबिक़ था ये शब बीमार पर भारी जो आगे थी सो अब भी है जुनूँ की गर्म-जोशी है वही दीवानों से अपनी वही दाग़ों की गुल-कारी जो आगे थी सो अब भी है वही बाज़ार-ए-गर्मी है मोहब्बत की हनूज़ 'आतिश' वो यूसुफ़ की ख़रीदारी जो आगे थी सो अब भी है

Haidar Ali Aatish

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ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते पयाम्बर न मुयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शरह-ए-आरज़ू करते मिरी तरह से मह-ओ-मेहर भी हैं आवारा किसी हबीब की ये भी हैं जुस्तुजू करते हमेशा रंग-ए-ज़माना बदलता रहता है सफ़ेद रंग हैं आख़िर सियाह मू करते लुटाते दौलत-ए-दुनिया को मय-कदे में हम तिलाई साग़र-ए-मय नुक़रई सुबू करते हमेशा मैं ने गरेबाँ को चाक चाक किया तमाम उम्र रफ़ूगर रहे रफ़ू करते जो देखते तिरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम असीर होने की आज़ाद आरज़ू करते बयाज़-ए-गर्दन-ए-जानाँ को सुब्ह कहते जो हम सितारा-ए-सहरी तकमा-ए-गुलू करते ये का'बे से नहीं बे-वज्ह निस्बत-ए-रुख़-ए-यार ये बे-सबब नहीं मुर्दे को क़िबला-रू करते सिखाते नाला-ए-शब-गीर को दर-अंदाज़ी ग़म-ए-फ़िराक़ का उस चर्ख़ को अदू करते वो जान-ए-जाँ नहीं आता तो मौत ही आती दिल-ओ-जिगर को कहाँ तक भला लहू करते न पूछ आलम-ए-बरगश्ता-तालई 'आतिश' बरसती आग जो बाराँ की आरज़ू करते

Haidar Ali Aatish

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ख़्वाहाँ तिरे हर रंग में ऐ यार हमीं थे यूसुफ़ था अगर तू तो ख़रीदार हमीं थे बे-दाद की महफ़िल में सज़ा-वार हमीं थे तक़्सीर किसी की हो गुनहगार हमीं थे वा'दा था हमीं से लब-ए-बाम आने का होना साए की तरह से पस-ए-दीवार हमीं थे कंघी तिरी ज़ुल्फ़ों की हमीं पर थी मुक़र्रर आईना दिखाते तुझे हर बार हमीं थे नेमत थी तिरे हुस्न की हिस्से में हमारे तू कान-ए-मलाहत था ख़रीदार हमीं थे सौदा-ज़दा ज़ुल्फ़ों का न था अपने सिवा एक आज़ाद दो-आलम था गिरफ़्तार हमीं थे तू और हम ऐ दोस्त थे यक-जान दो क़ालिब था ग़ैर सिवा अपने जो था यार हमीं थे बीमार-ए-मोहब्बत था सिवा अपने न कोई इक मुस्तहिक़-ए-शर्बत-ए-दीदार हमीं थे बे अपने बहलती थी तबीअत न किसी से दिल-सोज़ हमीं थे तिरे ग़म-ख़्वार हमीं थे इक जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ से ग़श आता था हमीं को दो नर्गिस-ए-बीमार के बीमार हमीं थे जब चाहते थे लेते थे आग़ोश में तुम को मजबूर से रह जाते थे मुख़्तार हमीं थे हम सा न कोई चाहने वाला था तुम्हारा मरते थे हमीं जान से बेज़ार हमीं थे बद-नाम मोहब्बत ने तिरी हम को किया था रुस्वा-ए-सर-ए-कूचा-ओ-बाज़ार हमें थे दिल ठोकरें खाता था न हर गाम किसी का इक ख़ाक में मिलते दम-ए-रफ़्तार हमीं थे भड़काने से 'आतिश' को जलाने लगे या तो अल्ताफ़-ओ-इनायत के सज़ा-वार हमीं थे

Haidar Ali Aatish

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ज़िंदे वही हैं जो कि हैं तुम पर मरे हुए बाक़ी जो हैं सो क़ब्र में मुर्दे भरे हुए मस्त-ए-अलस्त क़ुल्ज़ुम-ए-हस्ती में आए हैं मिस्ल-ए-हबाब अपना पियाला भरे हुए अल्लाह-रे सफा-ए-तन-ए-नाज़नीन-ए-यार मोती हैं कूट कूट के गोया भरे हुए दो दिन से पाँव जो नहीं दबवाए यार ने बैठे हैं हाथ हाथ के ऊपर धरे हुए इन अब्रूओं के हल्क़ा में वो अँखड़ियाँ नहीं दो ताक़ पर हैं दो गुल-ए-नर्गिस धरे हुए ब'अद-ए-फ़ना भी आएगी मुझ मस्त को न नींद बे-ख़िश्त-ए-ख़म लहद में सिरहाने धरे हुए निकलें जो अश्क बे-असर आँखों से क्या अजब पैदा हुए हैं तिफ़्ल हज़ारों मरे हुए लिक्खे गए बयाज़ों में अशआर-ए-इंतिख़ाब राइज रहे वही कि जो सिक्के खरे हुए उल्टा सफ़ों को तेग़ ने अबरू-ए-यार की तीर-ए-मिज़ा से दरहम-ओ-बरहम परे हुए 'आतिश' ख़ुदा ने चाहा तो दरिया-ए-इश्क़ में कूदे जो अब की हम तो वरे से परे हुए

Haidar Ali Aatish

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दहन पर हैं उन के गुमाँ कैसे कैसे कलाम आते हैं दरमियाँ कैसे कैसे ज़मीन-ए-चमन गुल खिलाती है क्या क्या बदलता है रंग आसमाँ कैसे कैसे तुम्हारे शहीदों में दाख़िल हुए हैं गुल-ओ-लाला-ओ-अर्ग़वाँ कैसे कैसे बहार आई है नश्शे में झूमते हैं मुरीदान-ए-पीर-ए-मुग़ाँ कैसे कैसे अजब क्या छुटा रूह से जामा-ए-तन लुटे राह में कारवाँ कैसे कैसे तप-ए-हिज्र की काहिशों ने किए हैं जुदा पोस्त से उस्तुख़्वाँ कैसे कैसे न मुड़ कर भी बे-दर्द क़ातिल ने देखा तड़पते रहे नीम-जाँ कैसे कैसे न गोर-ए-सिकंदर न है क़ब्र-ए-दारा मिटे नामियों के निशाँ कैसे कैसे बहार-ए-गुलिस्ताँ की है आमद आमद ख़ुशी फिरते हैं बाग़बाँ कैसे कैसे तवज्जोह ने तेरी हमारे मसीहा तवाना किए ना-तवाँ कैसे कैसे दिल-ओ-दीदा-ए-अहल-ए-आलम में घर है तुम्हारे लिए हैं मकाँ कैसे कैसे ग़म-ओ-ग़ुस्सा ओ रंज-ओ-अंदोह-ओ-हिर्मां हमारे भी हैं मेहरबाँ कैसे कैसे तिरे किल्क-ए-क़ुदरत के क़ुर्बान आँखें दिखाए हैं ख़ुश-रू जवाँ कैसे कैसे करे जिस क़दर शुक्र-ए-नेअमत वो कम है मज़े लूटती है ज़बाँ कैसे कैसे

Haidar Ali Aatish

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