तिरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है मिसाल-ए-रंग वो झोंका नज़र भी आता है तमाम शब जहाँ जलता है इक उदास दिया हवा की राह में इक ऐसा घर भी आता है वो मुझ को टूट के चाहेगा छोड़ जाएगा मुझे ख़बर थी उसे ये हुनर भी आता है उजाड़ बन में उतरता है एक जुगनू भी हवा के साथ कोई हम-सफ़र भी आता है वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था कि वो तो याद हमें भूल कर भी आता है जहाँ लहू के समुंदर की हद ठहरती है वहीं जज़ीरा-ए-लाल-ओ-गुहर भी आता है चले जो ज़िक्र फ़रिश्तों की पारसाई का तो ज़ेर-ए-बहस मक़ाम-ए-बशर भी आता है अभी सिनाँ को सँभाले रहें अदू मेरे कि उन सफ़ों में कहीं मेरा सर भी आता है कभी कभी मुझे मिलने बुलंदियों से कोई शुआ-ए-सुब्ह की सूरत उतर भी आता है इसी लिए मैं किसी शब न सो सका 'मोहसिन' वो माहताब कभी बाम पर भी आता है
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा दिल का आलम है तेरे बा'द ख़लाओं जैसा काश दुनिया मेरे एहसास को वापस कर दे ख़ामुशी का वही अंदाज़ सदाओं जैसा पास रह कर भी हमेशा वो बहुत दूर मिला उस का अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल था ख़ुदाओं जैसा कितनी शिद्दत से बहारों को था एहसास-ए-मआ'ल फूल खिल कर भी रहा ज़र्द ख़िज़ाओं जैसा क्या क़यामत है कि दुनिया उसे सरदार कहे जिस का अंदाज़-ए-सुख़न भी हो गदाओं जैसा फिर तेरी याद के मौसम ने जगाए महशर फिर मेरे दिल में उठा शोर हवाओं जैसा बारहा ख़्वाब में पा कर मुझे प्यासा 'मोहसिन' उस की ज़ुल्फ़ों ने किया रक़्स घटाओं जैसा
Mohsin Naqvi
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जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ ये दिल ये आसेब की नगरी मस्कन सोचूँ वहमों का सोच रहा हूँ इस नगरी में तू कब से मेहमान हुआ सहरा की मुँह-ज़ोर हवाएँ औरों से मंसूब हुईं मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ इतनी देर में उजड़े दिल पर कितने महशर बीत गए जितनी देर में तुझ को पा कर खोने का इम्कान हुआ कल तक जिस के गिर्द था रक़्साँ इक अम्बोह सितारों का आज उसी को तन्हा पा कर मैं तो बहुत हैरान हुआ उस के ज़ख़्म छुपा कर रखिए ख़ुद उस शख़्स की नज़रों से उस से कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बे-कार समझते थे उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ यूँँ भी कम-आमेज़ था 'मोहसिन' वो इस शहर के लोगों में लेकिन मेरे सामने आ कर और भी कुछ अंजान हुआ
Mohsin Naqvi
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अज़ाब-ए-दीद में आँखें लहू लहू कर के मैं शर्मसार हुआ तेरी जुस्तुजू कर के खंडर की तह से बुरीदा-बदन सरों के सिवा मिला न कुछ भी ख़ज़ानों की आरज़ू कर के सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के मसाफ़त-ए-शब-ए-हिज्राँ के बा'द भेद खुला हवा दुखी है चराग़ों की आबरू कर के ज़मीं की प्यास उसी के लहू को चाट गई वो ख़ुश हुआ था समुंदर को आबजू कर के ये किस ने हम से लहू का ख़िराज फिर माँगा अभी तो सोए थे मक़्तल को सुर्ख़-रू कर के जुलूस-ए-अहल-ए-वफ़ा किस के दर पे पहुँचा है निशान-ए-तौक़-ए-वफ़ा ज़ीनत-ए-गुलू कर के उजाड़ रुत को गुलाबी बनाए रखती है हमारी आँख तिरी दीद से वुज़ू कर के कोई तो हब्स-ए-हवा से ये पूछता 'मोहसिन' मिला है क्या उसे कलियों को बे-नुमू कर के
Mohsin Naqvi
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नया है शहर नए आसरे तलाश करूँँ तू खो गया है कहाँ अब तुझे तलाश करूँँ जो दश्त में भी जलाते थे फ़स्ल-ए-गुल के चराग़ मैं शहर में भी वही आबले तलाश करूँँ तू अक्स है तो कभी मेरी चश्म-ए-तर में उतर तिरे लिए मैं कहाँ आइने तलाश करूँँ तुझे हवा से की आवारगी का इल्म कहाँ कभी मैं तुझ को तिरे सामने तलाश करूँँ ग़ज़ल कहूँ कभी सादास ख़त लिखूँ उस को उदास दिल के लिए मश्ग़ले तलाश करूँँ मिरे वजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा कभी मैं ख़ुद को तिरे वास्ते तलाश करूँँ मैं चुप रहूँ कभी बे-वज्ह हँस पड़ूँ 'मोहसिन' उसे गँवा के अजब हौसले तलाश करूँँ
Mohsin Naqvi
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मैं दिल पे जब्र करूँँगा तुझे भुला दूँगा मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा ये तीरगी मिरे घर का ही क्यूँँ मुक़द्दर हो मैं तेरे शहर के सारे दिए बुझा दूँगा हवा का हाथ बटाऊँगा हर तबाही में हरे शजर से परिंदे मैं ख़ुद उड़ा दूँगा वफ़ा करूँँगा किसी सोगवार चेहरे से पुरानी क़ब्र पे कतबा नया सजा दूँगा इसी ख़याल में गुज़री है शाम-ए-दर्द अक्सर कि दर्द हद से बढ़ेगा तो मुस्कुरा दूँगा तू आसमान की सूरत है गर पड़ेगा कभी ज़मीं हूँ मैं भी मगर तुझ को आसरा दूँगा बढ़ा रही हैं मिरे दुख निशानियाँ तेरी मैं तेरे ख़त तिरी तस्वीर तक जला दूँगा बहुत दिनों से मिरा दिल उदास है 'मोहसिन' इस आइने को कोई अक्स अब नया दूँगा
Mohsin Naqvi
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