तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे चले गए तो पुकारेगी हर सदा हम को न जाने कितनी ज़बानों से हम बयाँ होंगे लहू लहू के सिवा कुछ न देख पाओगे हमारे नक़्श-ए-क़दम इस क़दर अयाँ होंगे समेट लीजिए भीगे हुए हर इक पल को बिखर गए जो ये मोती तो राएगाँ होंगे उचाट दिल का ठिकाना किसी को क्या मालूम हम अपने आप से बिछड़े तो फिर कहाँ होंगे हैं अपनी मौज के बहते हुए समुंदर हम तमाम दश्त-ए-जुनूँ में रवाँ-दवाँ होंगे ये बज़्म-ए-यार है क़ुर्बान जाइए इस पर सुना है 'अश्क' यहाँ दिल सभी जवाँ होंगे
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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा
Bashir Badr
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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ये प्यार तेरी भूल है क़ुबूल है मैं संग हूँ तू फूल है क़ुबूल है दग़ा भी दूँगा प्यार में कभी कभी कि ये मिरा उसूल है क़ुबूल है तुझे जहाँ अज़ीज़ है तो छोड़ जा मुझे ये शय फ़ुज़ूल है क़ुबूल है तू रूठेगी तो मैं मनाऊँगा नहीं जो रूल है वो रूल है क़ुबूल है लिपट ऐ शाखे गुल मगर ये सोच कर मेरा बदन बबूल है क़ुबूल है यही है गर तिरी रज़ा तो बोल फिर क़ुबूल है क़ुबूल है क़ुबूल है
Varun Anand
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है
Abbas Qamar
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क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता
Waseem Barelvi
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