tu ne dekha hai kabhi ek nazar shaam ke baad kitne chup-chap se lagte hain shajar shaam ke baad itne chup-chap ki raste bhi rahenge la-ilm chhod jaenge kisi roz nagar shaam ke baad main ne aise hi gunah teri judai men kiye jaise tufan men koi chhod de ghar shaam ke baad shaam se pahle vo mast apni udanon men raha jis ke hathon men the tuute hue par shaam ke baad raat biiti to gine aable aur phir socha kaun tha bais-e-aghhaz-e-safar shaam ke baad tu hai suraj tujhe maalum kahan raat ka dukh tu kisi roz mire ghar men utar shaam ke baad laut aae na kisi roz vo avara-mizaj khol rakhte hain isi aas pe dar shaam ke baad tu ne dekha hai kabhi ek nazar sham ke baad kitne chup-chap se lagte hain shajar sham ke baad itne chup-chap ki raste bhi rahenge la-ilm chhod jaenge kisi roz nagar sham ke baad main ne aise hi gunah teri judai mein kiye jaise tufan mein koi chhod de ghar sham ke baad sham se pahle wo mast apni udanon mein raha jis ke hathon mein the tute hue par sham ke baad raat biti to gine aable aur phir socha kaun tha bais-e-aghaz-e-safar sham ke baad tu hai suraj tujhe malum kahan raat ka dukh tu kisi roz mere ghar mein utar sham ke baad laut aae na kisi roz wo aawara-mizaj khol rakhte hain isi aas pe dar sham ke baad
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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दिल भी आवारा नज़र आवारा कट गया सारा सफ़र आवारा ज़िंदगी भटका हुआ जंगल है राह बेचैन शजर आवारा रूह की खिड़की से हम झाँकते हैं और लगता है नगर आवारा तुझ को मा'लूम कहाँ होगा कि शब कैसे करते हैं बसर आवारा मुझ को मा'लूम है अपने बारे हूँ बहुत अच्छा मगर आवारा ये अलग बात कि बस पल-दो-पल लौट के आते हैं घर आवारा
Farhat Abbas Shah
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ये जो ज़िंदगी है ये कौन है ये जो बेबसी है ये कौन है ये तुम्हारे लम्स को क्या हुआ ये जो बे-हिसी है ये कौन है वो जो मेरे जैसा था कौन था ये जो आप सी है ये कौन है मिरे चार-सू मिरे चार-सू ये जो बेकली है ये कौन है मिरे अंग अंग में बस गई ये जो शाइ'री है ये कौन है वो जो तीरगी थी वो कौन थी ये जो रौशनी है ये कौन है मुझे क्या ख़बर मुझे क्या पता ये जो बे-ख़ुदी है ये कौन है वो जो ग़म से चूर था कौन था जो ख़ुशी ख़ुशी है ये कौन है
Farhat Abbas Shah
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गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया जा तुझे आज से हम ने अपने ख़ुदा के हवाले किया एक मुद्दत हुई हम ने दुनिया की हर एक ज़िद छोड़ दी एक मुद्दत हुई हम ने दिल को वफ़ा के हवाले किया इस तरह हम ने तेरी मोहब्बत ज़माने के हाथों में दी जिस तरह गुल ने ख़ुश्बू को बाद-ए-सबा के हवाले किया बेबसी सी अजब ज़िंदगी में इक ऐसी भी आई कि जब हम ने चुप-चाप हाथों को रस्म-ए-हिना के हवाले किया ख़ून ने तेरी यादें सुलगती हुई रात को सौंप दीं आँसुओं ने तिरा दर्द रूखी हवा के हवाले किया
Farhat Abbas Shah
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तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द इतने चुप-चाप कि रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म छोड़ जाएँगे किसी रोज़ नगर शाम के बा'द मैं ने ऐसे ही गुनह तेरी जुदाई में किए जैसे तूफ़ाँ में कोई छोड़ दे घर शाम के बा'द शाम से पहले वो मस्त अपनी उड़ानों में रहा जिस के हाथों में थे टूटे हुए पर शाम के बा'द रात बीती तो गिने आबले और फिर सोचा कौन था बाइस-ए-आग़ाज़-ए-सफ़र शाम के बा'द तू है सूरज तुझे मा'लूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द लौट आए न किसी रोज़ वो आवारा-मिज़ाज खोल रखते हैं इसी आस पे दर शाम के बा'द
Farhat Abbas Shah
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इसी से होता है ज़ाहिर जो हाल दर्द का है सभी को कोई न कोई वबाल दर्द का है सहर सिसकते हुए आसमान से उतरी तो दिल ने जान लिया ये भी साल दर्द का है ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है अब इस के बा'द कोई राब्ता नहीं रखना ये बात तय हुई लेकिन सवाल दर्द का है ये दिल ये उजड़ी हुई चश्म-ए-नम ये तन्हाई हमारे पास तो जो भी है माल दर्द का है न तुम में सुख की कोई बात है न मुझ में है तुम्हारा और मेरा मिलना विसाल दर्द का है किसी ने पूछा के 'फ़रहत' बहुत हसीन हो तुम तो मुस्कुरा के कहा सब जमाल दर्द का है
Farhat Abbas Shah
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