ghazalKuch Alfaaz

गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया जा तुझे आज से हम ने अपने ख़ुदा के हवाले किया एक मुद्दत हुई हम ने दुनिया की हर एक ज़िद छोड़ दी एक मुद्दत हुई हम ने दिल को वफ़ा के हवाले किया इस तरह हम ने तेरी मोहब्बत ज़माने के हाथों में दी जिस तरह गुल ने ख़ुश्बू को बाद-ए-सबा के हवाले किया बेबसी सी अजब ज़िंदगी में इक ऐसी भी आई कि जब हम ने चुप-चाप हाथों को रस्म-ए-हिना के हवाले किया ख़ून ने तेरी यादें सुलगती हुई रात को सौंप दीं आँसुओं ने तिरा दर्द रूखी हवा के हवाले किया

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

77 likes

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

105 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

66 likes

More from Farhat Abbas Shah

ये जो ज़िंदगी है ये कौन है ये जो बेबसी है ये कौन है ये तुम्हारे लम्स को क्या हुआ ये जो बे-हिसी है ये कौन है वो जो मेरे जैसा था कौन था ये जो आप सी है ये कौन है मिरे चार-सू मिरे चार-सू ये जो बेकली है ये कौन है मिरे अंग अंग में बस गई ये जो शाइ'री है ये कौन है वो जो तीरगी थी वो कौन थी ये जो रौशनी है ये कौन है मुझे क्या ख़बर मुझे क्या पता ये जो बे-ख़ुदी है ये कौन है वो जो ग़म से चूर था कौन था जो ख़ुशी ख़ुशी है ये कौन है

Farhat Abbas Shah

1 likes

दिल भी आवारा नज़र आवारा कट गया सारा सफ़र आवारा ज़िंदगी भटका हुआ जंगल है राह बेचैन शजर आवारा रूह की खिड़की से हम झाँकते हैं और लगता है नगर आवारा तुझ को मा'लूम कहाँ होगा कि शब कैसे करते हैं बसर आवारा मुझ को मा'लूम है अपने बारे हूँ बहुत अच्छा मगर आवारा ये अलग बात कि बस पल-दो-पल लौट के आते हैं घर आवारा

Farhat Abbas Shah

2 likes

तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द इतने चुप-चाप कि रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म छोड़ जाएँगे किसी रोज़ नगर शाम के बा'द मैं ने ऐसे ही गुनह तेरी जुदाई में किए जैसे तूफ़ाँ में कोई छोड़ दे घर शाम के बा'द शाम से पहले वो मस्त अपनी उड़ानों में रहा जिस के हाथों में थे टूटे हुए पर शाम के बा'द रात बीती तो गिने आबले और फिर सोचा कौन था बाइस-ए-आग़ाज़-ए-सफ़र शाम के बा'द तू है सूरज तुझे मा'लूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द लौट आए न किसी रोज़ वो आवारा-मिज़ाज खोल रखते हैं इसी आस पे दर शाम के बा'द

Farhat Abbas Shah

6 likes

कहा मैं कहाँ हो तुम जवाब आया जहाँ हो तुम मिरे जीवन से ज़ाहिर हो मिरे ग़म में निहाँ हो तुम मिरी तो सारी दुनिया हो मिरा सारा जहाँ हो तुम मिरी सोचों के मेहवर हो मिरा ज़ोर-ए-बयाँ हो तुम मैं तो लफ़्ज़-ए-मोहब्बत हूँ मगर मेरी ज़बाँ हो तुम

Farhat Abbas Shah

8 likes

इसी से होता है ज़ाहिर जो हाल दर्द का है सभी को कोई न कोई वबाल दर्द का है सहर सिसकते हुए आसमान से उतरी तो दिल ने जान लिया ये भी साल दर्द का है ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है अब इस के बा'द कोई राब्ता नहीं रखना ये बात तय हुई लेकिन सवाल दर्द का है ये दिल ये उजड़ी हुई चश्म-ए-नम ये तन्हाई हमारे पास तो जो भी है माल दर्द का है न तुम में सुख की कोई बात है न मुझ में है तुम्हारा और मेरा मिलना विसाल दर्द का है किसी ने पूछा के 'फ़रहत' बहुत हसीन हो तुम तो मुस्कुरा के कहा सब जमाल दर्द का है

Farhat Abbas Shah

14 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Farhat Abbas Shah.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Farhat Abbas Shah's ghazal.