ghazalKuch Alfaaz

तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द इतने चुप-चाप कि रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म छोड़ जाएँगे किसी रोज़ नगर शाम के बा'द मैं ने ऐसे ही गुनह तेरी जुदाई में किए जैसे तूफ़ाँ में कोई छोड़ दे घर शाम के बा'द शाम से पहले वो मस्त अपनी उड़ानों में रहा जिस के हाथों में थे टूटे हुए पर शाम के बा'द रात बीती तो गिने आबले और फिर सोचा कौन था बाइस-ए-आग़ाज़-ए-सफ़र शाम के बा'द तू है सूरज तुझे मा'लूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द लौट आए न किसी रोज़ वो आवारा-मिज़ाज खोल रखते हैं इसी आस पे दर शाम के बा'द

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया जा तुझे आज से हम ने अपने ख़ुदा के हवाले किया एक मुद्दत हुई हम ने दुनिया की हर एक ज़िद छोड़ दी एक मुद्दत हुई हम ने दिल को वफ़ा के हवाले किया इस तरह हम ने तेरी मोहब्बत ज़माने के हाथों में दी जिस तरह गुल ने ख़ुश्बू को बाद-ए-सबा के हवाले किया बेबसी सी अजब ज़िंदगी में इक ऐसी भी आई कि जब हम ने चुप-चाप हाथों को रस्म-ए-हिना के हवाले किया ख़ून ने तेरी यादें सुलगती हुई रात को सौंप दीं आँसुओं ने तिरा दर्द रूखी हवा के हवाले किया

Farhat Abbas Shah

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दिल भी आवारा नज़र आवारा कट गया सारा सफ़र आवारा ज़िंदगी भटका हुआ जंगल है राह बेचैन शजर आवारा रूह की खिड़की से हम झाँकते हैं और लगता है नगर आवारा तुझ को मा'लूम कहाँ होगा कि शब कैसे करते हैं बसर आवारा मुझ को मा'लूम है अपने बारे हूँ बहुत अच्छा मगर आवारा ये अलग बात कि बस पल-दो-पल लौट के आते हैं घर आवारा

Farhat Abbas Shah

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ये जो ज़िंदगी है ये कौन है ये जो बेबसी है ये कौन है ये तुम्हारे लम्स को क्या हुआ ये जो बे-हिसी है ये कौन है वो जो मेरे जैसा था कौन था ये जो आप सी है ये कौन है मिरे चार-सू मिरे चार-सू ये जो बेकली है ये कौन है मिरे अंग अंग में बस गई ये जो शाइ'री है ये कौन है वो जो तीरगी थी वो कौन थी ये जो रौशनी है ये कौन है मुझे क्या ख़बर मुझे क्या पता ये जो बे-ख़ुदी है ये कौन है वो जो ग़म से चूर था कौन था जो ख़ुशी ख़ुशी है ये कौन है

Farhat Abbas Shah

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कहा मैं कहाँ हो तुम जवाब आया जहाँ हो तुम मिरे जीवन से ज़ाहिर हो मिरे ग़म में निहाँ हो तुम मिरी तो सारी दुनिया हो मिरा सारा जहाँ हो तुम मिरी सोचों के मेहवर हो मिरा ज़ोर-ए-बयाँ हो तुम मैं तो लफ़्ज़-ए-मोहब्बत हूँ मगर मेरी ज़बाँ हो तुम

Farhat Abbas Shah

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इसी से होता है ज़ाहिर जो हाल दर्द का है सभी को कोई न कोई वबाल दर्द का है सहर सिसकते हुए आसमान से उतरी तो दिल ने जान लिया ये भी साल दर्द का है ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है अब इस के बा'द कोई राब्ता नहीं रखना ये बात तय हुई लेकिन सवाल दर्द का है ये दिल ये उजड़ी हुई चश्म-ए-नम ये तन्हाई हमारे पास तो जो भी है माल दर्द का है न तुम में सुख की कोई बात है न मुझ में है तुम्हारा और मेरा मिलना विसाल दर्द का है किसी ने पूछा के 'फ़रहत' बहुत हसीन हो तुम तो मुस्कुरा के कहा सब जमाल दर्द का है

Farhat Abbas Shah

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