tu phuul ki manind na shabnam ki tarah aa ab ke kisi be-nam se mausam ki tarah aa har martaba aata hai mah-e-nau ki tarah tu is baar zara meri shab-e-ghham ki tarah aa hal karne hain mujh ko kai pechida masail ai jan-e-vafa gesu-e-pur-kham ki tarah aa zakhmon ko gavara nahin yak-rangi-e-halat nashtar ki tarah aa kabhi marham ki tarah aa nazdiki o duuri ki kashakash ko mita de is jang men tu sulh ke parcham ki tarah aa maana ki mira ghar tiri jannat to nahin hai duniya men miri laghhzish-e-adam ki tarah aa tu kuchh to mire zabt-e-mohabbat ka sila de hangam-e-fana dida-e-pur-nam ki tarah aa tu phul ki manind na shabnam ki tarah aa ab ke kisi be-nam se mausam ki tarah aa har martaba aata hai mah-e-nau ki tarah tu is bar zara meri shab-e-gham ki tarah aa hal karne hain mujh ko kai pechida masail ai jaan-e-wafa gesu-e-pur-kham ki tarah aa zakhmon ko gawara nahin yak-rangi-e-haalat nashtar ki tarah aa kabhi marham ki tarah aa nazdiki o duri ki kashakash ko mita de is jang mein tu sulh ke parcham ki tarah aa mana ki mera ghar teri jannat to nahin hai duniya mein meri laghzish-e-adam ki tarah aa tu kuchh to mere zabt-e-mohabbat ka sila de hangam-e-fana dida-e-pur-nam ki tarah aa
Related Ghazal
मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
70 likes
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
95 likes
बुलाती है मगर जाने का नहीं ये दुनिया है इधर जाने का नहीं मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर मगर हद से गुज़र जाने का नहीं ज़मीं भी सर पे रखनी हो तो रखो चले हो तो ठहर जाने का नहीं सितारे नोच कर ले जाऊँगा मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नहीं वबा फैली हुई है हर तरफ़ अभी माहौल मर जाने का नहीं वो गर्दन नापता है नाप ले मगर जालिम से डर जाने का नहीं
Rahat Indori
59 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Fana Nizami Kanpuri.
Similar Moods
More moods that pair well with Fana Nizami Kanpuri's ghazal.







