un ras bhari ankhon men haya khel rahi hai do zahr ke pyalon pe qaza khel rahi hai hain nargis-o-gul kis liye mashur-e-tamasha gulshan men koi shokh ada khel rahi hai us bazm men jaaen to ye kahti hain adaen kyuun aae ho, kya sar pe qaza khel rahi hai us chashm-e-siyah mast pe gesu hain pareshan maikhane pe ghanghor ghata khel rahi hai bad-masti men tum ne unhen kya kah diya 'akhtar' kyuun shokh-nigahon men haya khel rahi hai un ras bhari aankhon mein haya khel rahi hai do zahr ke pyalon pe qaza khel rahi hai hain nargis-o-gul kis liye mashur-e-tamasha gulshan mein koi shokh ada khel rahi hai us bazm mein jaen to ye kahti hain adaen kyun aae ho, kya sar pe qaza khel rahi hai us chashm-e-siyah mast pe gesu hain pareshan maikhane pe ghanghor ghata khel rahi hai bad-masti mein tum ne unhen kya kah diya 'akhtar' kyun shokh-nigahon mein haya khel rahi hai
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ ज़िंदगानी फिर कहाँ नादाँ जवानी फिर कहाँ दो घड़ी मिल बैठने को भी ग़नीमत जानिए उम्र फ़ानी ही सही ये उम्र-ए-फ़ानी फिर कहाँ आ कि हम भी इक तराना झूम कर गाते चलें इस चमन के ताएरों की हम-ज़बानी फिर कहाँ है ज़माना इश्क़-ए-सलमा में गँवा दे ज़िंदगी ये ज़माना फिर कहाँ ये ज़िंदगानी फिर कहाँ एक ही बस्ती में हैं आसाँ है मिलना आ मिलो क्या ख़बर ले जाए दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ फ़स्ल-ए-गुल जाने को है दौर-ए-ख़िज़ाँ आने को है ये चमन ये बुलबुलें ये नग़्मा-ख़्वानी फिर कहाँ फूल चुन जी खोल कर ऐश-ओ-तरब के फूल चुन मौसम-ए-गुल फिर कहाँ फस्ल-ए-जवानी फिर कहाँ आख़िरी रात आ गई जी भर के मिल लें आज तो तुम से मिलने देगा दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ आज आए हो तो सुनते जाओ ये ताज़ा ग़ज़ल वर्ना 'अख़्तर' फिर कहाँ ये शेर-ख़्वानी फिर कहाँ
Akhtar Shirani
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ग़म-ए-ज़माना नहीं इक अज़ाब है साक़ी शराब ला मिरी हालत ख़राब है साक़ी शबाब के लिए तौबा अज़ाब है साक़ी शराब ला मुझे पास-ए-शबाब है साक़ी उठा पियाला कि गुलशन पे फिर बरसने लगी वो मय कि जिस का क़दह माहताब है साक़ी निकाल पर्दा-ए-मीना से दुख़्तर-ए-रज़ को घटा में किस लिए ये माहताब है साक़ी तू वाइ'ज़ों की न सुन मय-कशों की ख़िदमत कर गुनह सवाब की ख़ातिर सवाब है साक़ी ज़माने-भर के ग़मों को है दावत-ए-ग़र्रा कि एक जाम में सब का जवाब है साक़ी कलाम जिस का है मे'राज 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम' यही वो 'अख़्तर'-ए-ख़ाना-ख़राब है साक़ी
Akhtar Shirani
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वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें मोहब्बत करें ख़ुश रहें मुस्कुरा दें ग़ुरूर और हमारा ग़ुरूर-ए-मोहब्बत मह ओ मेहर को उन के दर पर झुका दें जवानी हो गर जावेदानी तो या रब तिरी सादा दुनिया को जन्नत बना दें शब-ए-वस्ल की बे-ख़ुदी छा रही है कहो तो सितारों की शमएँ बुझा दें बहारें सिमट आएँ खिल जाएँ कलियाँ जो हम तुम चमन में कभी मुस्कुरा दें इबादत है इक बे-ख़ुदी से इबारत हरम को मय-ए-मुश्क-बू से बसा दें वो आएँगे आज ऐ बहार-ए-मोहब्बत सितारों के बिस्तर पे कलियाँ बिछा दें बनाता है मुँह तल्ख़ी-ए-मय से ज़ाहिद तुझे बाग़-ए-रिज़वाँ से कौसर मँगा दें जिन्हें उम्र भर याद आना सिखाया वो दिल से तिरी याद क्यूँँकर भुला दें तुम अफ़्साना-ए-क़ैस क्या पूछते हो इधर आओ हम तुम को लैला बना दें ये बे-दर्दियाँ कब तक ऐ दर्द-ए-ग़ुर्बत बुतों को फिर अर्ज़-ए-हरम में बसा दें वो सरमस्तियाँ बख़्श ऐ रश्क-ए-शीरीं कि ख़ुसरू को ख़्वाब-ए-अदम से जगा दें तिरे वस्ल की बे-ख़ुदी कह रही है ख़ुदाई तो क्या हम ख़ुदा को भुला दें उन्हें अपनी सूरत पे यूँँ नाज़ कब था मिरे इश्क़-ए-रुस्वा को 'अख़्तर' दुआ दें
Akhtar Shirani
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काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें मुझ को ये ए'तिराफ़ दु'आओं में है असर जाएँ न अर्श पर जो दुआएँ तो क्या करें इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम नाज़िल हों दिल पे रोज़ बलाएँ तो क्या करें ज़ुल्मत-ब-दोश है मिरी दुनिया-ए-आशिक़ी तारों की मिशअले न चुराएँ तो क्या करें शब भर तो उन की याद में तारे गिना किए तारे से दिन को भी नज़र आएँ तो क्या करें अहद-ए-तरब की याद में रोया किए बहुत अब मुस्कुरा के भूल न जाएँ तो क्या करें अब जी में है कि उन को भुला कर ही देख लें वो बार बार याद जो आएँ तो क्या करें वअ'दे के ए'तिबार में तस्कीन-ए-दिल तो है अब फिर वही फ़रेब न खाएँ तो क्या करें तर्क-ए-वफ़ा भी जुर्म-ए-मोहब्बत सही मगर मिलने लगें वफ़ा की सज़ाएँ तो क्या करें
Akhtar Shirani
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मोहब्बत की दुनिया में मशहूर कर दूँ मिरी सादा-दिल तुझ को मग़रूर कर दूँ तिरे दिल को मिलने की ख़ुद आरज़ू हो तुझे इस क़दर ग़म से रंजूर कर दूँ मुझे ज़िंदगी दूर रखती है तुझ से जो तू पास हो तो उसे दूर कर दूँ मोहब्बत के इक़रार से शर्म कब तक कभी सामना हो तो मजबूर कर दूँ मिरे दिल में है शोला-ए-हुस्न रक़्साँ मैं चाहूँ तो हर ज़र्रे को तूर कर दूँ ये बे-रंगियाँ कब तक ऐ हुस्न-ए-रंगीं इधर आ तुझे इश्क़ में चूर कर दूँ तू गर सामने हो तो मैं बे-ख़ुदी में सितारों को सज्दे पे मजबूर कर दूँ सियह-ख़ाना-ए-ग़म है साक़ी ज़माना बस इक जाम और नूर ही नूर कर दूँ नहीं ज़िंदगी को वफ़ा वर्ना 'अख़्तर' मोहब्बत से दुनिया को मामूर कर दूँ
Akhtar Shirani
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