vaqt ki taaq pe donon ki sajai hui raat kis pe kharchi hai bata meri kamai hui raat aur phir yuun hua ankhon ne lahu barsaya yaad aai koi barish men bitai hui raat hijr ke ban men hiran apna bhi mera hi gaya usrat-e-ram se bahar-hal rihai hui raat tu to ik lafz-e-mohabbat ko liye baitha hai to kahan jaati mire jism pe aai hui raat dil ko chain aaya to uthne laga taron ka ghhubar subh le nikli mire haath men aai hui raat aur phir niind hi aai na koi khvab aaya main ne chahi thi mire khvab men aai hui raat waqt ki taq pe donon ki sajai hui raat kis pe kharchi hai bata meri kamai hui raat aur phir yun hua aankhon ne lahu barsaya yaad aai koi barish mein bitai hui raat hijr ke ban mein hiran apna bhi mera hi gaya usrat-e-ram se bahar-haal rihai hui raat tu to ek lafz-e-mohabbat ko liye baitha hai to kahan jati mere jism pe aai hui raat dil ko chain aaya to uthne laga taron ka ghubar subh le nikli mere hath mein aai hui raat aur phir nind hi aai na koi khwab aaya main ne chahi thi mere khwab mein aai hui raat
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
Tehzeeb Hafi
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे
Kumar Vishwas
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कोई हसीं तो कोई दर्दनाक समझेगा मेरा मिजाज़ वही ठीक ठाक समझेगा मैं जिस के साथ कई रातों से हूँ उस का नाम बता तो दूँगा मगर तू मज़ाक़ समझेगा वो जिस हिसाब से गाता है उस से लगता है कि मेरे दुख को तो बस बी प्राक समझेगा
Kushal Dauneria
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वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात किस पे ख़र्ची है बता मेरी कमाई हुई रात और फिर यूँँ हुआ आँखों ने लहू बरसाया याद आई कोई बारिश में बिताई हुई रात हिज्र के बन में हिरन अपना भी मेरा ही गया उसरत-ए-रम से बहर-हाल रिहाई हुई रात तू तो इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत को लिए बैठा है तो कहाँ जाती मिरे जिस्म पे आई हुई रात दिल को चैन आया तो उठने लगा तारों का ग़ुबार सुब्ह ले निकली मिरे हाथ में आई हुई रात और फिर नींद ही आई न कोई ख़्वाब आया मैं ने चाही थी मिरे ख़्वाब में आई हुई रात
Vipul Kumar
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शहर-ए-नाज़ुक से वो बारीक सड़क जाती है मैं बस इक पाँव टिकाता हूँ तड़क जाती है और पैवस्त हुआ जाता है पत्थर में चराग़ लग के उस हाथ से लौ और भड़क जाती है मैं बुरा चोर नहीं हूँ मगर उस कूचे में दिल धड़क जाता है पा-पोश खड़क जाती है फूल ख़ुशबू से बिगड़ते हैं हमें भी ले चल और झोंके से वो दामन को झड़क जाती है ख़्वाब का रिज़्क़ हुई जाती है बेदारी की उम्र नींद क्या चीज़ है आँखों में रड़क जाती है
Vipul Kumar
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फ़र्ज़-ए-सुपुर्दगी में तक़ाज़े नहीं हुए तेरे कहाँ से हों कि हम अपने नहीं हुए कुछ क़र्ज़ अपनी ज़ात के हो भी गए वसूल जैसे तिरे सुपुर्द थे वैसे नहीं हुए अच्छा हुआ कि हम को मरज़ ला-दवा मिला अच्छा नहीं हुआ कि हम अच्छे नहीं हुए उस के बदन का मूड बड़ा ख़ुश-गवार है हम भी सफ़र में उम्र से ठहरे नहीं हुए इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए हम आ के तेरी बज़्म में बे-शक हुए ज़लील जितने गुनाहगार थे उतने नहीं हुए इस बार जंग उस से र'ऊनत की थी सो हम अपनी अना के हो गए उस के नहीं हुए
Vipul Kumar
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जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे फिर बदन और कहीं काम में लाना है मुझे इश्क़ पाँव से लिपटता है तो रुक जाता हूँ वर्ना तुम हो तो तुम्हें छोड़ के जाना है मुझे मेरे हाथों को ख़ुदा रक्खे तिरे जिस्म की ख़ैर मसअला ये है तुझे हाथ लगाना है मुझे दिल को धड़का सा लगा रहता है वो जान न ले और फिर जब्र तो ये है कि बताना है मुझे माँग लेता हूँ तिरे ग़म से ज़रा सरदारी एक दुनिया है जिसे दिल से उठाना है मुझे
Vipul Kumar
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