वो जो आए हयात याद आई भूली बिसरी सी बात याद आई कि हाल-ए-दिल उन सेे कहके जब लौटे उन सेे कहने की बात याद आई आपने दिन बना दिया था जिसे ज़िन्दगी भर वो रात याद आई तेरे दर से उठे ही थे कि हमें तंगी-ए-काएनात याद आई
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे
Ali Zaryoun
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हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए इश्क़ के मग़्फ़िरत की दुआ कीजिए इस सलीक़े से उन से गिला कीजिए जब गिला कीजिए हँस दिया कीजिए दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए सामने आइना रख लिया कीजिए आप सुख से हैं तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ के बा'द इतनी जल्दी न ये फ़ैसला कीजिए ज़िंदगी कट रही है बड़े चैन से और ग़म हों तो वो भी अता कीजिए कोई धोका न खा जाए मेरी तरह ऐसे खुल के न सब से मिला कीजिए अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार' अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए
Khumar Barabankvi
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वो सिवा याद आए भुलाने के बा'द ज़िंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बा'द दिल सुलगता रहा आशियाने के बा'द आग ठंडी हुई इक ज़माने के बा'द रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा ऐसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बा'द जब न कुछ बन पड़ा अर्ज़-ए-ग़म का जवाब वो ख़फ़ा हो गए मुस्कुराने के बा'द दुश्मनों से पशेमान होना पड़ा दोस्तों का ख़ुलूस आज़माने के बा'द रंज हद से गुज़र के ख़ुशी बन गया हो गए पार हम डूब जाने के बा'द बख़्श दे या रब अहल-ए-हवस को बहिश्त मुझ को क्या चाहिए तुझ को पाने के बा'द कैसे कैसे गिले याद आए 'ख़ुमार' उन के आने से क़ब्ल उन के जाने के बा'द
Khumar Barabankvi
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तू चाहिए न तेरी वफ़ा चाहिए मुझे कुछ भी न तेरे ग़म के सिवा चाहिए मुझे मरने से पहले शक्ल ही इक बार देख लूँ ऐ मौत ज़िंदगी का पता चाहिए मुझे या रब मुआ'फ़ कर के न दे कर्ब-ए-इंफ़ि'आल मैं ने ख़ताएँ की हैं सज़ा चाहिए मुझे ख़ामोशी-ए-हयात से उकता गया हूँ मैं अब चाहे दिल ही टूटे सदा चाहिए मुझे उन मस्त मस्त आँखों में आँसू अरे ग़ज़ब ये इश्क़ है तो क़हर-ए-ख़ुदा चाहिए मुझे नासेह नसीहतों का ज़माना गुज़र गया अब प्यारे सिर्फ़ तेरी दुआ चाहिए मुझे हर दर्द को दवा की ज़रूरत है ऐ 'ख़ुमार' जो दर्द ख़ुद हो अपनी दवा चाहिए मुझे
Khumar Barabankvi
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क्या हुआ हुस्न है हम-सफ़र या नहीं इश्क़ मंज़िल ही मंज़िल है रस्ता नहीं दो परिंदे उड़े आँख नम हो गई आज समझा कि मैं तुझ को भूला नहीं तर्क-ए-मय को अभी दिन ही कितने हुए कुछ कहा मय को ज़ाहिद तो अच्छा न हर नज़र मेरी बन जाती ज़ंजीर-ए-पा उस ने जाते हुए मुड़ के देखा नहीं छोड़ भी दे मिरा साथ ऐ ज़िंदगी मुझ को तुझ से नदामत है शिकवा नहीं तू ने तौबा तो कर ली मगर ऐ 'ख़ुमार' तुझ को रहमत पे शायद भरोसा नहीं
Khumar Barabankvi
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अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से ये क्यूँँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं बहुत ख़ुश हैं गुस्ताख़ियों पर हमारी ब-ज़ाहिर जो बरहम नज़र आ रहे हैं ये कैसी हवा-ए-तरक़्क़ी चली है दीए तो दीए दिल बुझे जा रहे हैं बहिश्त-ए-तसव्वुर के जलवे हैं मैं हूँ जुदाई सलामत मज़े आ रहे हैं बहारों में भी मय से परहेज़ तौबा ‘ख़ुमार’ आप काफ़िर हुए जा रहे हैं
Khumar Barabankvi
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