ye ruke ruke se aansu ye dabi dabi si aahen yunhi kab talak khudaya ghham-e-zindagi nibahen kahin zulmaton men ghir kar hai talash-e-dasht-e-rahbar kahin jagmaga uthi hain mire naqsh-e-pa se rahen tire khanuman-kharabon ka chaman koi na sahra ye jahan bhi baith jaaen vahin in ki bargahen kabhi jada-e-talab se jo phira huun dil-shikasta tiri aarzu ne hans kar vahin daal di hain banhen mire ahd men nahin hai ye nishan-e-sar-bulandi ye range hue amame ye jhuki jhuki kulahen ye ruke ruke se aansu ye dabi dabi si aahen yunhi kab talak khudaya gham-e-zindagi nibahen kahin zulmaton mein ghir kar hai talash-e-dasht-e-rahbar kahin jagmaga uthi hain mere naqsh-e-pa se rahen tere khanuman-kharabon ka chaman koi na sahra ye jahan bhi baith jaen wahin in ki bargahen kabhi jada-e-talab se jo phira hun dil-shikasta teri aarzu ne hans kar wahin dal di hain banhen mere ahd mein nahin hai ye nishan-e-sar-bulandi ye range hue amame ye jhuki jhuki kulahen
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
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जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम यूँँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया
Majrooh Sultanpuri
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आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ता'बीर न देख देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख वही 'मजरूह' वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख
Majrooh Sultanpuri
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कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से तुम मिरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँँही चला जाता हूँ जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा
Majrooh Sultanpuri
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जला के मिश'अल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ 'मजरूह' बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले
Majrooh Sultanpuri
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यूँँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं मिलने को यूँँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं
Majrooh Sultanpuri
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