सेवइयाँ खाने का मन करता है कब हारे में रखी हांडी उतरेगी कब माँ सवइयाँ परोसेगी कब से थाली लिए खड़ी हूँ पहले धुआँ गहरा था आँखों में चुभता था खारा था बहुत अब हल्का है झीना है ख़ुशबू आती है धुएँ से गुर गुर की आवाज़ें आने लगी है माँ हांडी उतार लो सवइयाँ पक गई हैं
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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किस धुन में रहती हो तुम उलझे हुए बालों की गिर्हें तुम से नहीं सुलझती क्या लाओ इन्हें मैं सुलझा दूँ ऊन के उलझे गुच्छों से ये बाल तुम्हारे सुलझे तो रेशम हो जाएँ और बालों को सुलझाने के बहाने जीवन की उलझन सुलझाऊँ घने बनों में शंख बजाऊँ और तितली बन कर उड़ जाऊँ शाख़ों को मैं रक़्स दिखाऊँ एक काग़ज़ की नाव बनाऊँ तुझ को दूर बहा ले जाऊँ और तेरे दुख की वर्षा में अंतर्मन तक भीगती जाऊँ आ अजनबी सी लड़की मैं तेरी बचपन की सी सहेली हो जाऊँ
Varsha Gorchhia
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बातों का मर्तबान अचानक छूट गया है हाथों से बातों के नाज़ुक जिस्म अब लफ़्ज़ों की किरचों से ज़ख़्मी है और लहू-लुहान बे-बस से हैं ख़याल और मा'नी भी उछल कर दूर पड़े हैं कोने में रोते से बिलखते से सारे एहसास पड़े है फ़र्श पे मर कर भार पोंछ कर समेट लूँ फिर भी चखते तो न मिटेंगे
Varsha Gorchhia
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तमाम ख़्वाबों की आँखें अधूरे फ़साने के आख़िरी गीत को तुम्हारी आँखों से सुनना चाहेंगी दर्द फ़सुर्दा रातों के ज़र्द चेहरे तुम्हारी परछाइयों में पनाह ढूँडेंगे रौशन यादों के मुर्दा मुरझाए बदन काँच की मोटी धुँदली दीवार में दफ़्न रहेंगे उम्मीदों के जनाज़े रोज़ उठेंगे चीख़ों के हल्क़ से ज़बानें खींच ली जाएँगी आहों के क़द कटवा दिए जाएँगे तुम्हें पुकारूँगी भी तो कैसे मगर ता-उम्र ये नज़रें तुम्हें ढूँडेंगी
Varsha Gorchhia
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ख़याल कुछ यूँँ बिलखते हैं सीने में जैसे गुनाह पिघलते हों जैसे लफ़्ज़ चटकते हों जैसे रूहें बिछड़ती हों जैसे लाशें फंफनाती हों जैसे लम्स खुरदुरे हों जैसे लब दरदरे हों जैसे कोई बदन कतरता हो जैसे कोई समन कचरता हो ख़याल तेरे कुछ यूँँ बिलखते हैं सीने में
Varsha Gorchhia
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"कान्हा" आओ न किसी दिन यमुना किनारे कभी किसी बड़ या पीपल पर चढ़ें कोई पीला सा आँचल क्यूँँ नहीं देते सौग़ात में मुझे भी दूर-दूर चलें चारागाहों में खेलें मिल कर दोनों मीठा सा राग क्यूँँ नहीं सुनाते मुझे कभी तो सताओ कभी तो मटकी फोड़ो चुरा लो मक्खन कभी तो कान्हा कहाँ हो तुम आओ न रास-लीला करो कभी मेरे साथ भी
Varsha Gorchhia
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