आओ कि आज ग़ौर करें इस सवाल पर देखे थे हम ने जो वो हसीं ख़्वाब क्या हुए दौलत बढ़ी तो मुल्क में अफ़्लास क्यूँँ बढ़ा ख़ुश-हाली-ए-अवाम के अस्बाब क्या हुए जो अपने साथ साथ चले कू-ए-दार तक वो दोस्त वो रफ़ीक़ वो अहबाब क्या हुए क्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून का मरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुए बे-कस बरहनगी को कफ़न तक नहीं नसीब वो व'अदा-हा-ए-अतलस-ओ-किम-ख़्वाब क्या हुए जम्हूरियत-नवाज़ बशर-दोस्त अम्न-ख़्वाह ख़ुद को जो ख़ुद दिए थे वो अलक़ाब क्या हुए मज़हब का रोग आज भी क्यूँँ ला-इलाज है वो नुस्ख़ा-हा-ए-नादिर-ओ-नायाब क्या हुए हर कूचा शोला-ज़ार है हर शहर क़त्ल-गाह यक-जहती-ए-हयात के आदाब क्या हुए सहरा-ए-तीरगी में भटकती है ज़िंदगी उभरे थे जो उफ़ुक़ पे वो महताब क्या हुए मुजरिम हूँ मैं अगर तो गुनहगार तुम भी हो ऐ रहबरना-ए-क़ौम ख़ता-कार तुम भी हो
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"तेरी याद है" मैं हूँ ये काली अँधेरी रात है तन्हाई है और तेरी याद है मेरे हाथ में क़लम है पास में रखा एक गिलास है जो शराब से भरा है तुझे याद किए जा रहा हूँ शराब पीते हुए नज़्म लिखते जा रहा हूँ सुनो मेरे लिखे नज़्म तो पढ़ोगी ना ख़्वाबों में मुलाक़ात तो करोगी ना प्यार से न सही, नफ़रत से ही मुझे याद तो करोगी ना जब याद आए मेरी तो ये भी ख़याल करना मैं तेरी आवाज़ सुनने को परेशान रहता हूँ मैं तुझे एक बार देखना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कि तू फिर से मेरे सर पे हाथ फेरे मैं ये भी चाहता हूँ कि तू फिर से आए मेरे पास और आ कर फिर कभी न जाए पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता ऐसा होना तो नामुम्किन है
Rovej sheikh
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ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
Faiz Ahmad Faiz
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"वो सुब्ह कभी तो आएगी" 1 वो सुब्ह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्में गाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे सीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी 2 वो सुब्ह हमीं से आएगी जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे उस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे दुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी
Sahir Ludhianvi
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हिरास तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर मेरे तख़्य्युल में रह रह के झलक उठती है यूँ अचानक तिरे आरिज़ का ख़याल आता है जैसे ज़ुल्मत में कोई शमां भड़क उठती है तेरे पैराहन-ए-रंगीं की जुनूं-ख़ेज़ महक ख़्वाब बन बन के मिरे ज़ेहन में लहराती है रात की सर्द ख़मोशी में हर इक झोंके से तेरे अन्फ़ास तिरे जिस्म की आँच आती है मैं सुलगते हुए राज़ों को अयां तो कर दूँ लेकिन उन राज़ों की तशहीर से जी डरता है रात के ख़्वाब उजाले में बयाँ तो कर दूँ उन हसीं ख़्वाबों की ता'बीर से जी डरता है तेरी साँसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत दर-हक़ीक़त कोई रंगीन शरारत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो सोचता हूँ कि तुझे मिल के मैं जिस सोच में हूँ पहले उस सोच का मक़्सूम समझ लूँ तो कहूँ मैं तिरे शहर में अंजान हूँ परदेसी हूँ तेरे अल्ताफ़ का मफ़्हूम समझ लूँ तो कहूँ कहीं ऐसा न हो पाँव मिरे थर्रा जाएँ और तिरी मरमरीं बाँहों का सहारा न मिले अश्क बहते रहें ख़ामोश सियह रातों में और तिरे रेशमी आंचल का किनारा न मिले
Sahir Ludhianvi
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साथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिए चाँद तारों बहारों के सपने बुने हुस्न और इश्क़ के गीत गाता रहा आरज़ूओं के ऐवाँ सजाता रहा मैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिए जब भी आया नए गीत लाता रहा आज लेकिन मिरे दामन-ए-चाक में गर्द-ए-राह-ए-सफ़र के सिवा कुछ नहीं मेरे बरबत के सीने में नग़्मों का दम घुट गया तानें चीख़ों के अम्बार में दब गई हैं और गीतों के सुर हिचकियाँ बन गए हैं मैं तुम्हारा मुग़न्नी हूँ नग़्मा नहीं हूँ और नग़्में की तख़्लीक़ का साज़-ओ-सामाँ साथियो! आज तुम ने भस्म कर दिया है और मैं अपना टूटा हुआ साज़ था में सर्द लाशों के अम्बार को तक रहा हूँ मेरे चारों तरफ़ मौत की वहशतें नाचती हैं और इंसाँ की हैवानियत जाग उठी है बरबरियत के ख़ूँ-ख़ार इफ़रीत अपने नापाक जबड़ों को खोले ख़ून पी पी के ग़ुर्रा रहे हैं बच्चे माँओं की गोदों में सह में हुए हैं इस्मतें सर-बरहना परेशान हैं हर तरफ़ शोर-ए-आह-ओ-बुका है और मैं इस तबाही के तूफ़ान में आग और ख़ूँ के हैजान में सर-निगूँ और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों पर अपने नग़्मों की झोली पसारे दर-ब-दर फिर रहा हूँ मुझ को अम्न और तहज़ीब की भीक दो मेरे गीतों की लय मेरा सुर मेरी नय मेरे मजरूह होंटों को फिर सौंप दो साथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिए इंक़लाब और बग़ावत के नग़्में अलापे अजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव में सरफ़रोशी के ख़्वाबीदा जज़्बे उभारे और उस सुब्ह की राह देखी जिस में इस मुल्क की रूह आज़ाद हो आज ज़ंजीर-ए-महकूमियत कट चुकी है और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं खेत सोना उगलने को बेचैन हैं वादियाँ लहलहाने को बेताब हैं कोहसारों के सीने में हैजान है संग और ख़िश्त बे-ख़्वाब व बेदार हैं उन की आँखों में तामीर के ख़्वाब हैं उन के ख़्वाबों को तकमील का रूप दो मुल्क की वादियाँ घाटियाँ खेतियाँ औरतें बच्चियां हाथ फैलाए ख़ैरात की मुंतज़िर हैं इन को अम्न और तहज़ीब की भीक दो माँओं को उन के होंटों की शादाबियाँ नन्हे बच्चों को उन की ख़ुशी बख़्श दो मुल्क की रूह को ज़िंदगी बख़्श दो मुझ को मेरा हुनर मेरी लय बख़्श दो आज सारी फ़ज़ा है भिकारी और मैं इस भिकारी फ़ज़ा में अपने नग़्मों की झोली पसारे दर-ब-दर फिर रहा हूँ मुझ को फिर मेरा खोया हुआ साज़ दो मैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिए जब भी आया नए गीत लाता रहूँगा
Sahir Ludhianvi
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ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के ये लुटते हुए कारवां ज़िन्दगी के कहाँ हैं, कहाँ है, मुहाफ़िज़ ख़ुदी के जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियां जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन थकी-हारी साँसों पे तबले की धन-धन ये बेरूह कमरों में खांसी की ठन-ठन जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियाँ भी ये बीवी भी है और बहन भी है, मां भी जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंज़र दिखाओ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उन को लाओ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
Sahir Ludhianvi
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मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी किसी गेसू किसी आंचल का सहारा भी नहीं रास्ते में कोई धुंदला सा सितारा भी नहीं मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए रौशनी लेने को निकला तो अंधेरे पाए रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
Sahir Ludhianvi
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