nazmKuch Alfaaz

ऐ आरज़ू-ए-हयात अब की बार जान भी छोड़ तुझे ख़बर ही नहीं कैसे दिन गुज़रते हैं ऐ आरज़ू-ए-नफ़स अब मुआ'फ़ कर मुझ को तुझे ये इल्म नहीं कितनी महँगी हैं साँसें कि तू तो लफ़्ज़ है बस एक लफ़्ज़ अध-मुर्दा तिरे ख़मीर की मिट्टी का रंग लाल गुलाल सुलगती आग ने तुझ को जना है और तू ख़ुद इक ऐसी बाँझ है जिस से कोई उम्मीद नहीं तू ऐसा ज़हर है जो पी के कोई भी इंसाँ ख़ुद अपने आप को कोई ख़ुदा समझता है तू इक शजर है जो बस धूप बाँटता ही रहे तू इक सफ़र है जो सदियों से बढ़ता जाता है तू ऐसा दम है जो मुर्दों को ज़िंदा करता है तू वो करम है जो हर इक करीम माँगता है तू वो तलब है जिसे ख़ुद ख़ुदा भी पूजते हैं तू वो तरब है जिसे ख़ुद ख़ुशी भी माँगती है तू मुझ को जितने भी अब शोख़ रंग दिखलाए तू चाहे ज़िंदगी को मेरे पास ले आए वक़ार अब तिरे क़दमों में गिरने वाला नहीं ऐ आरज़ू-ए-हयात अब मैं पहले वाला नहीं

Waqar Khan0 Likes

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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मैं मोहब्बत के सितारों से निकलता हुआ नूर हक़-ओ-नाहक़ के लिबादों में छुपा एक शुऊ'र मेरे ही दम से हुआ मस्जिद-ओ-मंदिर का ज़ुहूर मैं मुस्लमान-ओ-बरहमन के इरादों का फ़ुतूर मैं हया-ज़ादी-ओ-ख़ुश-नैन के होंटों का सुरूर किसी मजबूर तवाइफ़ की निगाहों का क़ुसूर मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं ख़ुद ही ज़मीं पर जाऊँ और ज़मीं-ज़ाद का ख़ुद जा के मैं अंजाम करूँँ वो ज़मीं-ज़ाद कि एहसान-फ़रामोश है जो वो ज़मीं-ज़ाद कि जो ख़ुद ही ज़मीं पर उतरा और ज़मीं वो जो वफ़ादार नहीं हो सकती वो ज़मीं जिस पे कई ख़ून के इल्ज़ाम लगे वो ज़मीं जिस ने यहाँ देखे हैं कटते हुए सर वो ज़मीं देती रही है जो गुनाहों को पनाह वो ज़मीं जिस ने छुपाए हैं कई राज़-ओ-नियाज़ साज़िशें होती रहीं जिस पे मोहब्बत के ख़िलाफ़ और वो चुप है उगलती ही नहीं एक भी लफ़्ज़ मसअला ये है कि अब किस से गवाही माँगूँ

Waqar Khan

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ख़ला की मुश्किलात अपनी जगह क़ाएम थीं और दुनिया उजड़ती भरभरी बंजर ज़मीनों की निशानी थी सितारे सुर्ख़ थे और चाँद सूरज पर अँधेरों का बसेरा था दरख़्तों पर परिंदों की जगह वीरानियों के घोंसले होते ज़मीं की कोख में बस थूर था और ख़ार उगते थे हवा को साँस लेने में बहुत दुश्वारियाँ होतीं तो फिर उस नूर वाले ने कोई लौह-ए-अनारा भेज दी शायद अँधेरे रौशनी पे किस तरह ईमान ले आए बलाएँ किस तरह परियों की सूरत में चली आईं ये किस नौरल सुवैबा की ख़ुदा तख़्लीक़ कर बैठा ये नर्मी दिलबरी शर्म-ओ-हया तख़्लीक़ कर बैठा वो नौरल वो सुवैबा जिस की ख़ातिर आसमाँ से रंग उतरे थे वो जिस के दम से दुनिया पर नज़ाकत का वजूद आया ख़ुदा-ए-ख़ल्क़ ने नौरल से पहले ही हवस तख़्लीक़ कर दी थी नज़ाकत तक हवस की दस्तरस तख़्लीक़ कर दी थी हज़ारों साल गुज़रे हैं मगर फ़ितरत नहीं बदली निगाहें अब भी भूकी हैं कि जैसे खा ही जाएँगी हवस-ज़ादों ने कैसे नूर से मुँह पर मली कालक हर इक रिश्ता ज़रूरत के मुताबिक़ किस लिए बदला हवस-ज़ादो बदन-ख़ोरो ज़रा सी शर्म फ़रमाओ वो नौरल वो सुवैबा रौशनी का इस्तिआ'रा थी कभी हव्वा कभी मरियम कभी लौह-ए-अनारा थी वो औरत थी

Waqar Khan

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