nazmKuch Alfaaz

ख़ला की मुश्किलात अपनी जगह क़ाएम थीं और दुनिया उजड़ती भरभरी बंजर ज़मीनों की निशानी थी सितारे सुर्ख़ थे और चाँद सूरज पर अँधेरों का बसेरा था दरख़्तों पर परिंदों की जगह वीरानियों के घोंसले होते ज़मीं की कोख में बस थूर था और ख़ार उगते थे हवा को साँस लेने में बहुत दुश्वारियाँ होतीं तो फिर उस नूर वाले ने कोई लौह-ए-अनारा भेज दी शायद अँधेरे रौशनी पे किस तरह ईमान ले आए बलाएँ किस तरह परियों की सूरत में चली आईं ये किस नौरल सुवैबा की ख़ुदा तख़्लीक़ कर बैठा ये नर्मी दिलबरी शर्म-ओ-हया तख़्लीक़ कर बैठा वो नौरल वो सुवैबा जिस की ख़ातिर आसमाँ से रंग उतरे थे वो जिस के दम से दुनिया पर नज़ाकत का वजूद आया ख़ुदा-ए-ख़ल्क़ ने नौरल से पहले ही हवस तख़्लीक़ कर दी थी नज़ाकत तक हवस की दस्तरस तख़्लीक़ कर दी थी हज़ारों साल गुज़रे हैं मगर फ़ितरत नहीं बदली निगाहें अब भी भूकी हैं कि जैसे खा ही जाएँगी हवस-ज़ादों ने कैसे नूर से मुँह पर मली कालक हर इक रिश्ता ज़रूरत के मुताबिक़ किस लिए बदला हवस-ज़ादो बदन-ख़ोरो ज़रा सी शर्म फ़रमाओ वो नौरल वो सुवैबा रौशनी का इस्तिआ'रा थी कभी हव्वा कभी मरियम कभी लौह-ए-अनारा थी वो औरत थी

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

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उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस के सारे आँसू गंगा जल में बदल रहे थे उस दिन उस के होंठ गुलाबी नीलकमल में बदल रहे थे उस दिन आँखों के सपने काले बादल में बदल रहे थे उस दिन हम दोनों के निर्णय अंतिम पल में बदल रहे थे उस दिन कुछ पाने की आशा नहीं मगर सब कुछ खोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस की दो आँखों में अनबोये बबूल उग आए उस दिन आँखें पछतातीं थीं क्यूँ सपने फिजूल उग आए उस दिन दोनों के चेहरों पर चारों तरफ़ शूल उग आए उस दिन जहाँ गिरे थे आँसू फौरन वहाँ फूल उग आए उस दिन पता चला था हम को फूल नहीं आँसू बोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन दोनों हर दुविधा को कर स्वीकार लिपट कर रोए उस दिन दोनों जग से छुप कर नदिया पार लिपट कर रोए उस दिन हर-पल ख़ुश रहने वाले त्योहार लिपट कर रोए उस दिन दोनों पहले पहले अंतिम बार लिपट कर रोए उस दिन की यादों को सारे जीवन दोनों को ढोना था उस दिन हमें अलग होना था

Gyan Prakash Akul

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"दुख" मुझे जो लगा, वो नहीं हूँ मैं अब उस जगह तो नहीं हूँ तू इक कॉल मैसेज नहीं कर रही है कि ऐसी वो क्या ही शिकायत है? जो मुझ सेे तू कर नहीं पा रही है बताती नहीं है सताती रही है मुझे तू बता क्यूँ ख़फ़ा है मुझे तू बता क्या हुआ है तू कुछ बोल ये ख़ामोशी काटती है मुझे जान ले बस ये आँखें किसे रोती है बस? मुझे किस का दुख है? मुझे पूछ तू फिर बताऊँ तेरा नाम मैं और तुझे मैं सुनाऊँ दिखाऊँ मेरा ग़म मेरे ज़ख़्म जो भर नहीं पा रहे हैं मुझे तेरे ऐसे सताने का दुख है तेरे लौट के फिर न आने का दुख है मेरे पास आ मेरा दुख जान लड़की सखी कोई इतना ख़फ़ा भी नहीं होता है जैसे कि तू है कि ग़ुस्सा ज़ियादा दिनो तक नहीं करना होता है समझी ए लड़की कि ग़लती भुलाने के ख़ातिर बनी है मोहब्बत निभाने के ख़ातिर बनी है कि जब दोस्ती कर ली जाए उसे फिर निभाना भी होता है लड़की मुझे याद है तू मगर मैं भुलाया गया हूँ तू बेशक मुझे छोड़ दे पर ज़रा सुन कहीं भी कभी भी किसी भी हाँ दरिया ने प्यासे को प्यासा नहीं मारा है फिर तो अब तू चली आ घड़ी हाथ की बंद हो जाए इस सेे के पहले चली आ मेरे हाथ को थाम ले दोस्त ये ज़िंदगी बाय बोले मुझे इस सेे पहले तू आ और मुझे तू गले से लगा ले

BR SUDHAKAR

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मैं मोहब्बत के सितारों से निकलता हुआ नूर हक़-ओ-नाहक़ के लिबादों में छुपा एक शुऊ'र मेरे ही दम से हुआ मस्जिद-ओ-मंदिर का ज़ुहूर मैं मुस्लमान-ओ-बरहमन के इरादों का फ़ुतूर मैं हया-ज़ादी-ओ-ख़ुश-नैन के होंटों का सुरूर किसी मजबूर तवाइफ़ की निगाहों का क़ुसूर मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं ख़ुद ही ज़मीं पर जाऊँ और ज़मीं-ज़ाद का ख़ुद जा के मैं अंजाम करूँँ वो ज़मीं-ज़ाद कि एहसान-फ़रामोश है जो वो ज़मीं-ज़ाद कि जो ख़ुद ही ज़मीं पर उतरा और ज़मीं वो जो वफ़ादार नहीं हो सकती वो ज़मीं जिस पे कई ख़ून के इल्ज़ाम लगे वो ज़मीं जिस ने यहाँ देखे हैं कटते हुए सर वो ज़मीं देती रही है जो गुनाहों को पनाह वो ज़मीं जिस ने छुपाए हैं कई राज़-ओ-नियाज़ साज़िशें होती रहीं जिस पे मोहब्बत के ख़िलाफ़ और वो चुप है उगलती ही नहीं एक भी लफ़्ज़ मसअला ये है कि अब किस से गवाही माँगूँ

Waqar Khan

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ऐ आरज़ू-ए-हयात अब की बार जान भी छोड़ तुझे ख़बर ही नहीं कैसे दिन गुज़रते हैं ऐ आरज़ू-ए-नफ़स अब मुआ'फ़ कर मुझ को तुझे ये इल्म नहीं कितनी महँगी हैं साँसें कि तू तो लफ़्ज़ है बस एक लफ़्ज़ अध-मुर्दा तिरे ख़मीर की मिट्टी का रंग लाल गुलाल सुलगती आग ने तुझ को जना है और तू ख़ुद इक ऐसी बाँझ है जिस से कोई उम्मीद नहीं तू ऐसा ज़हर है जो पी के कोई भी इंसाँ ख़ुद अपने आप को कोई ख़ुदा समझता है तू इक शजर है जो बस धूप बाँटता ही रहे तू इक सफ़र है जो सदियों से बढ़ता जाता है तू ऐसा दम है जो मुर्दों को ज़िंदा करता है तू वो करम है जो हर इक करीम माँगता है तू वो तलब है जिसे ख़ुद ख़ुदा भी पूजते हैं तू वो तरब है जिसे ख़ुद ख़ुशी भी माँगती है तू मुझ को जितने भी अब शोख़ रंग दिखलाए तू चाहे ज़िंदगी को मेरे पास ले आए वक़ार अब तिरे क़दमों में गिरने वाला नहीं ऐ आरज़ू-ए-हयात अब मैं पहले वाला नहीं

Waqar Khan

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