मैं मोहब्बत के सितारों से निकलता हुआ नूर हक़-ओ-नाहक़ के लिबादों में छुपा एक शुऊ'र मेरे ही दम से हुआ मस्जिद-ओ-मंदिर का ज़ुहूर मैं मुस्लमान-ओ-बरहमन के इरादों का फ़ुतूर मैं हया-ज़ादी-ओ-ख़ुश-नैन के होंटों का सुरूर किसी मजबूर तवाइफ़ की निगाहों का क़ुसूर मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं ख़ुद ही ज़मीं पर जाऊँ और ज़मीं-ज़ाद का ख़ुद जा के मैं अंजाम करूँँ वो ज़मीं-ज़ाद कि एहसान-फ़रामोश है जो वो ज़मीं-ज़ाद कि जो ख़ुद ही ज़मीं पर उतरा और ज़मीं वो जो वफ़ादार नहीं हो सकती वो ज़मीं जिस पे कई ख़ून के इल्ज़ाम लगे वो ज़मीं जिस ने यहाँ देखे हैं कटते हुए सर वो ज़मीं देती रही है जो गुनाहों को पनाह वो ज़मीं जिस ने छुपाए हैं कई राज़-ओ-नियाज़ साज़िशें होती रहीं जिस पे मोहब्बत के ख़िलाफ़ और वो चुप है उगलती ही नहीं एक भी लफ़्ज़ मसअला ये है कि अब किस से गवाही माँगूँ
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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ऐ आरज़ू-ए-हयात अब की बार जान भी छोड़ तुझे ख़बर ही नहीं कैसे दिन गुज़रते हैं ऐ आरज़ू-ए-नफ़स अब मुआ'फ़ कर मुझ को तुझे ये इल्म नहीं कितनी महँगी हैं साँसें कि तू तो लफ़्ज़ है बस एक लफ़्ज़ अध-मुर्दा तिरे ख़मीर की मिट्टी का रंग लाल गुलाल सुलगती आग ने तुझ को जना है और तू ख़ुद इक ऐसी बाँझ है जिस से कोई उम्मीद नहीं तू ऐसा ज़हर है जो पी के कोई भी इंसाँ ख़ुद अपने आप को कोई ख़ुदा समझता है तू इक शजर है जो बस धूप बाँटता ही रहे तू इक सफ़र है जो सदियों से बढ़ता जाता है तू ऐसा दम है जो मुर्दों को ज़िंदा करता है तू वो करम है जो हर इक करीम माँगता है तू वो तलब है जिसे ख़ुद ख़ुदा भी पूजते हैं तू वो तरब है जिसे ख़ुद ख़ुशी भी माँगती है तू मुझ को जितने भी अब शोख़ रंग दिखलाए तू चाहे ज़िंदगी को मेरे पास ले आए वक़ार अब तिरे क़दमों में गिरने वाला नहीं ऐ आरज़ू-ए-हयात अब मैं पहले वाला नहीं
Waqar Khan
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ख़ला की मुश्किलात अपनी जगह क़ाएम थीं और दुनिया उजड़ती भरभरी बंजर ज़मीनों की निशानी थी सितारे सुर्ख़ थे और चाँद सूरज पर अँधेरों का बसेरा था दरख़्तों पर परिंदों की जगह वीरानियों के घोंसले होते ज़मीं की कोख में बस थूर था और ख़ार उगते थे हवा को साँस लेने में बहुत दुश्वारियाँ होतीं तो फिर उस नूर वाले ने कोई लौह-ए-अनारा भेज दी शायद अँधेरे रौशनी पे किस तरह ईमान ले आए बलाएँ किस तरह परियों की सूरत में चली आईं ये किस नौरल सुवैबा की ख़ुदा तख़्लीक़ कर बैठा ये नर्मी दिलबरी शर्म-ओ-हया तख़्लीक़ कर बैठा वो नौरल वो सुवैबा जिस की ख़ातिर आसमाँ से रंग उतरे थे वो जिस के दम से दुनिया पर नज़ाकत का वजूद आया ख़ुदा-ए-ख़ल्क़ ने नौरल से पहले ही हवस तख़्लीक़ कर दी थी नज़ाकत तक हवस की दस्तरस तख़्लीक़ कर दी थी हज़ारों साल गुज़रे हैं मगर फ़ितरत नहीं बदली निगाहें अब भी भूकी हैं कि जैसे खा ही जाएँगी हवस-ज़ादों ने कैसे नूर से मुँह पर मली कालक हर इक रिश्ता ज़रूरत के मुताबिक़ किस लिए बदला हवस-ज़ादो बदन-ख़ोरो ज़रा सी शर्म फ़रमाओ वो नौरल वो सुवैबा रौशनी का इस्तिआ'रा थी कभी हव्वा कभी मरियम कभी लौह-ए-अनारा थी वो औरत थी
Waqar Khan
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