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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए

Divya 'Kumar Sahab'

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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