हवा भी ख़ुश-गवार है गुलों पे भी निखार है तरन्नुम-ए-हज़ार है बहार पुर-बहार है कहाँ चला है साक़िया इधर तो लौट इधर तो आ अरे ये देखता है क्या उठा सुबू सुबू उठा सुबू उठा प्याला भर प्याला भर के दे इधर चमन की सम्त कर नज़र समाँ तो देख बे-ख़बर वो काली काली बदलियाँ उफ़ुक़ पे हो गईं अयाँ वो इक हुजूम-ए-मय-कशाँ है सू-ए-मय-कदा रवाँ ये क्या गुमाँ है बद-गुमाँ समझ न मुझ को ना-तवाँ ख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँ अभी तो मैं जवान हूँ इबादतों का ज़िक्र है नजात की भी फ़िक्र है जुनून है सवाब का ख़याल है अज़ाब का मगर सुनो तो शैख़ जी अजीब शय हैं आप भी भला शबाब ओ आशिक़ी अलग हुए भी हैं कभी हसीन जल्वा-रेज़ हों अदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ हों हवाएँ इत्र-बेज़ हों तो शौक़ क्यूँँ न तेज़ हों निगार-हा-ए-फ़ित्नागर कोई इधर कोई उधर उभारते हों ऐश पर तो क्या करे कोई बशर चलो जी क़िस्सा-मुख़्तसर तुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़र दुरुस्त है तो हो मगर अभी तो मैं जवान हूँ ये गश्त कोहसार की ये सैर जू-ए-बार की ये बुलबुलों के चहचहे ये गुल-रुख़ों के क़हक़हे किसी से मेल हो गया तो रंज ओ फ़िक्र खो गया कभी जो बख़्त सो गया ये हँस गया वो रो गया ये इश्क़ की कहानियाँ ये रस भरी जवानियाँ उधर से मेहरबानियाँ इधर से लन-तरानियाँ ये आसमान ये ज़मीं नज़ारा-हा-ए-दिल-नशीं इन्हें हयात-आफ़रीं भला मैं छोड़ दूँ यहीं है मौत इस क़दर क़रीं मुझे न आएगा यक़ीं नहीं नहीं अभी नहीं अभी तो मैं जवान हूँ न ग़म कुशूद ओ बस्त का बुलंद का न पस्त का न बूद का न हस्त का न वादा-ए-अलस्त का उम्मीद और यास गुम हवा से गुम क़यास गुम नज़र से आस पास गुम हमा-बजुज़ गिलास गुम न मय में कुछ कमी रहे क़दह से हमदमी रहे नशिस्त ये जमी रहे यही हमा-हामी रहे वो राग छेड़ मुतरिबा तरब-फ़ज़ा, अलम-रुबा असर सदा-ए-साज़ का जिगर में आग दे लगा हर एक लब पे हो सदा न हाथ रोक साक़िया पिलाए जा पिलाए जा अभी तो मैं जवान हूँ
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"मैं और मेरी दुनिया" एक ऐसी दुनिया जिस में सिर्फ़ मैं हूँ और सब कुछ मेरे इर्द-गिर्द बुना हुआ जहाँ ख़यालों का आसमाँ है और दिल की ज़मीं है ख़्वाबों के कुछ शजर हैं नीचे अश्कों की नमी है ख़ुशियों की हवा है जो हौले से मुझे छू कर मुस्कुराते हुए गुज़र जाती है ग़मो की बारिश भी है जो दिल की ज़मीं सोख लेती है और तन्हाइयों के मौसम में अक्सर उगने लगते है अहसास के नन्हे पौधे खिलने लगती है उन में अल्फ़ाज़ की नन्ही कलियाँ और फिर बिखर जाती हैं सफ़्हों की फ़िज़ा में कोई ग़ज़ल या नज़्म बनकर
Priya omar
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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"वो एक ख़्वाब था" वो एक ख़्वाब था जो अब मुझे नहीं आता और कोई शख़्श इन आँखों को अब नहीं भाता न जाने क्यूँ ही हौसलों को हम सँभाले हैं ये जबकि जानते हैं दूर अब उजाले हैं उसे न चाह थी पर इश्क़ कर लिया हम ने चराग़ को हवा की सम्त रख दिया हम ने किसी दरख़्त के साए में मिला था मुझ को मुझे उलझाए हुए ख़ुद में मिला था मुझ को गले से लग के मेरी रूह को राहत दी थी उदास चेहरे को अपनी हथेलियाँ दी थी मेरे माथे की सलवटों को चूम कर उस ने जो न क़िस्मत में लिखी थीं मुझे ख़ुशियाँ दी थीं ख़ुशी के आँसुओं में उस को डूबते देखा मैं ने उस रोज़ यूँँ सूरज को डूबते देखा चाँद का रंग फिर घुला था शफ़क़ में ऐसे मेरा रंग उस के रंग में हो घुल गया जैसे शादमानी सी हरारत हुई कोई दिल में कोई तितली-सी बदन में मेरे उड़ी जैसे मुझे यूँँ भी लगा ये वक़्त ठहर जाए कहीं या तो मर जाऊँ या मैं उस का ही हो जाऊँ अभी रात उस रात के तो बा'द भी बहुत आईं ढूँढ़ता था मगर आहट तेरी नहीं पाई ये बात और है क़िस्मत बदल नहीं सकती मैं चाहे जितना चाह लूँ तू मिल नहीं सकती ख़फ़ा रहो मगर मेरे सामने तो आओ तुम न कुछ कहो अगर तो आँख तो दिखाओ तुम मैं जानता हूँ मैं ने दर्द दिया है तुम को किसी तरह से मेरे दर्द को मिटाओ तुम हथेलियों में मेरी सब्र की लकीर न थी तुझे मिल पाऊँ मैं ऐसी भी तो तक़दीर न थी उसी शिद्दत से ही मैं अब भी चाहता हूँ तुम्हें न हो यक़ीन अगर इंतिज़ार देख मेरा फिरूँ मैं दर-ब-दर कि अब कहाँ को जाऊँ मैं एक मुश्ताक़ था बेज़ार न हो जाऊँ मैं थी ये तलब कि तुझ पे जाँ निसार कर दूँ मैं और अब यूँँ है कि तैयार न हो जाऊँ कहीं
anupam shah
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डिसबिलिटी एक फूल बगिया में मैं ने देखा है जिस में एक पंखुड़ी कम है बाक़ी सारे फूलों से पर उसे मुयस्सर है एक सा हवा पानी एक जैसे रंग-ओ-बू एक जैसा ही जादू तितलियाँ हों भँवरें हों या किसी की नज़रें हों उस में और औरों में फ़र्क़ ही नहीं करतीं हाँ मगर मिरे प्यारे ये चमन का क़िस्सा था आदमी की बस्ती में इस तरह नहीं होता फूल रोता रहता है फ़र्क़ होता रहता है
Ashu Mishra
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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आज बादल ख़ूब बरसा और बरस कर खुल गया गुल्सिताँ की डाली डाली पत्ता पत्ता धुल गया देखना क्या धुल गया सारे का सारा आसमाँ ऊदा ऊदा नीला नीला प्यारा प्यारा आसमाँ हट गया बादल का पर्दा मिल गई किरनों को राह सल्तनत पर अपनी फिर ख़ुर्शीद ने डाली निगाह धूप में है घास पर पानी के क़तरों की चमक मात है इस वक़्त मोती और हीरे की दमक दे रही है लुत्फ़ क्या सरसब्ज़ पेड़ों की क़तार और हरी शाख़ों पे है रंगीन फूलों की बहार क्या परिंदे फिर रहे हैं चहचहाते हर तरफ़ रागनी बरसात की ख़ुश हो के गाते हर तरफ़ देखना वो क्या अचम्भा है अरे वो देखना आसमाँ पर इन दरख़्तों से परे वो देखना ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ किस मुसव्विर ने भरे हैं रंग ऐसे ख़ुशनुमा इस का हर इक रंग है आँखों में जैसे खुब गया इक जगह कैसे इकट्ठे कर दिए हैं सात रंग शोख़ हैं सातों के सातों इक नहीं है मात रंग है ये क़ुदरत का नज़ारा और क्या कहिए इसे बस यही जी चाहता है देखते रहिए इसे नन्हे नन्हे जम्अ'' थे पानी के कुछ क़तरे वहाँ उन पे डाला अक्स सूरज ने बना दी ये कमाँ देखो देखो अब मिटी जाती है वो प्यारी धनक देखते ही देखते गुम हो गई सारी धनक फिर हवा में मिल गई वो सब की सब कुछ भी नहीं आँखें मल मल कर न देखो आओ अब कुछ भी नहीं
Hafeez Jalandhari
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लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना ग़ज़ल-ख़्वाँ उस को जाना हम ने शाइ'र उस को गर्दाना फ़क़त सूरत ही देखी उस के मअ'नी हम नहीं समझे न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर मुक़य्यद अब नहीं 'इक़बाल' अपने जिस्म-ए-फ़ानी में नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी ज़िंदगी उस की त आला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की जिसे हम मुर्दा समझे ज़िंदा तर पाइंदा तर निकला मह ओ ख़ुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के
Hafeez Jalandhari
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देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी आ हा जी गुल-नारी चुनरी रंग रंगीली प्यारी चुनरी मलमल की इक तारी चुनरी नाज़ुक नाज़ुक सारी चुनरी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी अम्मी के कुछ जी में आया गोटे का इक थान मंगाया चुनरी पर सारा चिपकाया हर कोने पर फूल बनाया देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी लचका है हाथों में लचकता गोटा है कुंदन सा दमकता रौशनी में कैसा है चमकता हाथ लगाने से है मसकता देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी इस को ख़राब होने न दूँगी बैठूँगी तो सँभाल रखूँगी घर में जा कर रख छोड़ूँगी और तेहवार के दिन ओढ़ूँगी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी
Hafeez Jalandhari
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इक बार फिर वतन में गया जा के आ गया लख़्त-ए-जिगर को ख़ाक में दफ़ना के आ गया हर हम-सफ़र पे ख़िज़्र का धोका हुआ मुझे आब-ए-बक़ा की राह से कतरा के आ गया हूर-ए-लहद ने छीन लिया तुझ को और मैं अपना सा मुँह लिए हुए शरमा के आ गया दिल ले गया मुझे तिरी तुर्बत पे बार बार आवाज़ दे के बैठ के उक्ता के आ गया रोया कि था जहेज़ तिरा वाजिब-उल-अदा मेंह मोतियों का क़ब्र पे बरसा के आ गया मेरी बिसात क्या थी हुज़ूर-ए-रज़ा-ए-दोस्त तिनका सा एक सामने दरिया के आ गया अब के भी रास आई न हुब्ब-ए-वतन 'हफ़ीज़' अब के भी एक तीर-ए-क़ज़ा खा के आ गया
Hafeez Jalandhari
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उट्ठी है मग़रिब से घटा पीने का मौसम आ गया है रक़्स में इक मह-लक़ा नाज़ुक अदा नाज़-आफ़रीं हाँ नाचती जा गाए जा नज़रों से दिल बर्माए जा तड़पाए जा तड़पाए जा ओ दुश्मन-ए-दुनिया-ओ-दीं! तेरा थिरकना ख़ूब है तेरी अदाएँ दिल-नशीं लेकिन ठहर तू कौन है ओ नीम-उर्यां नाज़नीं क्या मशरिक़ी औरत है तू हरगिज़ नहीं हरगिज़ नहीं तेरी हँसी बेबाक है तेरी नज़र चालाक है उफ़ किस क़दर दिल-सोज़ है तक़रीर बाज़ारी तिरी कितनी हवस-आमोज़ है ये सादा पुरकारी तिरी शर्म और इज़्ज़त वालियाँ होती हैं इफ़्फ़त वालियाँ वो हुस्न की शहज़ादियाँ पर्दे की हैं आबादियाँ चश्म-ए-फ़लक ने आज तक देखी नहीं उन की झलक सरमाया-ए-शर्म-ओ-हया ज़ेवर है उन के हुस्न का शौहर के दुख सहती हैं वो मुँह से नहीं कहती हैं वो कब सामने आती हैं वो ग़ैरत से कट जाती हैं वो एज़ाज़-ए-मिल्लत उन से है नाम-ए-शराफ़त उन से है ईमान पर क़ाएम हैं वो पाकीज़ा-ओ-साएम हैं वो तुझ में नहीं शर्म-ओ-हया तुझ में नहीं मेहर-ओ-वफ़ा सच सच बता तू कौन है ओ बे-हया तू कौन है एहसास-ए-इज़्ज़त क्यूँँ नहीं शर्म और ग़ैरत क्यूँँ नहीं ये पुर-फ़ुसूँ ग़म्ज़े तिरे ना-महरमों के सामने हट सामने से दूर हो मरदूद हो मक़हूर हो तक़दीर की हेटी है तू शैतान की बेटी है तू जिस क़ौम की औरत है तू उस क़ौम पर लअ'नत है तू लेकिन ठहर जाना ज़रा तेरी नहीं कोई ख़ता मर्दों में ग़ैरत ही नहीं क़ौमी हमीयत ही नहीं वो मिल्लत-ए-बैज़ा कि थी सारे जहाँ की रौशनी जमइय्यत-ए-इस्लामियाँ शाहनशह-ए-हिन्दोस्ताँ अब इस में दम कुछ भी नहीं हम क्या हैं हम कुछ भी नहीं मिल्ली सियासत उठ गई बाज़ू की ताक़त उठ गई शान-ए-हिजाज़ी अब कहाँ वो तुर्कताज़ी अब कहाँ अब ग़ज़नवी हिम्मत गई अब बाबरी शौकत गई ईमान आलमगीर का मुस्लिम के दिल से उठ गया क़ौम अब जफ़ा-पेशा हुई इज़्ज़त गदा-पेशा हुई अब रंग ही कुछ और है बे-ग़ैरती का दौर है ये क़ौम अब मिटने को है ये नर्द अब पिटने को है अफ़्सोस ये हिन्दोस्ताँ! ये गुलशन-ए-जन्नत-निशाँ! ईमान-दारों का वतन ताअ'त-गुज़ारों का वतन रह जाएगा वीराना फिर बन जाएगा बुत-ख़ाना फिर लेकिन मुझे क्या ख़ब्त है तक़रीर क्यूँँ बे-रब्त है ऐसा बहक जाता हूँ मैं मुँह आई बक जाता हूँ मैं इतना शराबी हो गया अक़्ल-ओ-ख़िरद को खो गया मुझ को ज़माने से ग़रज़ मिटने मिटाने से ग़रज़ हिन्दोस्ताँ से काम क्या अंदेशा-ए-अंजाम क्या जीने दो जीने दो मुझे पीने दो पीने दो मुझे जब हश्र का दिन आएगा उस वक़्त देखा जाएगा हाँ नाचती जा गाए जा नज़रों से दिल बर्माए जा तड़पाए जा तड़पाए जा ओ दुश्मन-ए-दुनिया-ओ-दीं
Hafeez Jalandhari
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