nazmKuch Alfaaz

आज बादल ख़ूब बरसा और बरस कर खुल गया गुल्सिताँ की डाली डाली पत्ता पत्ता धुल गया देखना क्या धुल गया सारे का सारा आसमाँ ऊदा ऊदा नीला नीला प्यारा प्यारा आसमाँ हट गया बादल का पर्दा मिल गई किरनों को राह सल्तनत पर अपनी फिर ख़ुर्शीद ने डाली निगाह धूप में है घास पर पानी के क़तरों की चमक मात है इस वक़्त मोती और हीरे की दमक दे रही है लुत्फ़ क्या सरसब्ज़ पेड़ों की क़तार और हरी शाख़ों पे है रंगीन फूलों की बहार क्या परिंदे फिर रहे हैं चहचहाते हर तरफ़ रागनी बरसात की ख़ुश हो के गाते हर तरफ़ देखना वो क्या अचम्भा है अरे वो देखना आसमाँ पर इन दरख़्तों से परे वो देखना ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ किस मुसव्विर ने भरे हैं रंग ऐसे ख़ुशनुमा इस का हर इक रंग है आँखों में जैसे खुब गया इक जगह कैसे इकट्ठे कर दिए हैं सात रंग शोख़ हैं सातों के सातों इक नहीं है मात रंग है ये क़ुदरत का नज़ारा और क्या कहिए इसे बस यही जी चाहता है देखते रहिए इसे नन्हे नन्हे जम्अ'' थे पानी के कुछ क़तरे वहाँ उन पे डाला अक्स सूरज ने बना दी ये कमाँ देखो देखो अब मिटी जाती है वो प्यारी धनक देखते ही देखते गुम हो गई सारी धनक फिर हवा में मिल गई वो सब की सब कुछ भी नहीं आँखें मल मल कर न देखो आओ अब कुछ भी नहीं

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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इमारत और शौकत और सरमाए की तस्वीरें ये ऐवानात सब हैं हाल ही की ताज़ा तामीरें इधर कुछ फ़ासले पर चंद घर थे काश्त-कारों के जहाँ अब कार-ख़ाने बन गए सरमाया-दारों के मवेशी हो गए नीलाम क्यूँँ ये कोई क्या जाने कचेहरी जाने साहूकार जाने या ख़ुदा जाने ज़मीं-दारों को जा कर देख ले जो भी कोई चाहे नए भट्टों में ईंटें थापते फिरते हैं हलवाहे यहाँ अपने पुराने गाँव का अब क्या रहा बाक़ी यही तकिया यही इक मैं यही इक झोंपड़ा बाक़ी अज़ीमुश्शान बस्ती है ये नौ-आबाद वीराना यहाँ हम अजनबी दोनों हैं मैं और मेरा काशाना

Hafeez Jalandhari

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ऐ देखने वालो इस हुस्न को देखो इस राज़ को समझो ये नक़्श-ए-ख़याली ये फ़िक्रत-ए-आली ये पैकर-ए-तनवीर ये कृष्ण की तस्वीर मअ'नी है कि सूरत सनअ'त है कि फ़ितरत ज़ाहिर है कि मस्तूर नज़दीक है या दूर ये नार है या नूर दुनिया से निराला ये बाँसुरी वाला गोकुल का ग्वाला है सेहर कि ए'जाज़ खुलता ही नहीं राज़ क्या शान है वल्लाह क्या आन है वल्लाह हैरान हूँ क्या है इक शान-ए-ख़ुदा है बुत-ख़ाने के अंदर ख़ुद हुस्न का बुत-गर बुत बन गया आ कर वो तुर्फ़ा नज़्ज़ारे याद आ गए सारे जमुना के किनारे सब्ज़े का लहकना फूलों का महकना घनघोर घटाएँ सरमस्त हवाएँ मासूम उमंगें उल्फ़त की तरंगें वो गोपियों के साथ हाथों में दिए हाथ रक़्साँ हुआ ब्रिजनाथ बंसी में जो लय है नश्शा है न मय है कुछ और ही शय है इक रूह है रक़्साँ इक कैफ़ है लर्ज़ां एक अक़्ल है मय-नोश इक होश है मदहोश इक ख़ंदा है सय्याल इक गिर्या है ख़ुश-हाल इक इश्क़ है मग़रूर इक हुस्न है मजबूर इक सेहर है मसहूर दरबार में तन्हा लाचार है कृष्णा आ श्याम इधर आ सब अहल-ए-ख़ुसूमत हैं दर पए इज़्ज़त ये राज दुलारे बुज़दिल हुए सारे पर्दा न हो ताराज बेकस की रहे लाज आ जा मेरे काले भारत के उजाले दामन में छुपा ले वो हो गई अन-बन वो गर्म हुआ रन ग़ालिब है दुर्योधन वो आ गए जगदीश वो मिट गई तशवीश अर्जुन को बुलाया उपदेश सुनाया ग़म-ज़ाद का ग़म क्या उस्ताद का ग़म क्या लो हो गई तदबीर लो बन गई तक़दीर लो चल गई शमशीर सीरत है अदू-सोज़ सूरत नज़र-अफ़रोज़ दिल कैफ़ियत-अंदोज़ ग़ुस्से में जो आ जाए बिजली ही गिरा जाए और लुत्फ़ पर आए तो घर भी लुटा जाए परियों में है गुलफ़ाम राधा के लिए श्याम बलराम का भय्या मथुरा का बसय्या बिंद्रा में कन्हैय्या बन हो गए वीराँ बर्बाद गुलिस्ताँ सखियाँ हैं परेशाँ जमुना का किनारा सुनसान है सारा तूफ़ान हैं ख़ामोश मौजों में नहीं जोश लौ तुझ से लगी है हसरत ही यही है ऐ हिन्द के राजा इक बार फिर आ जा दुख दर्द मिटा जा अब्र और हवा से बुलबुल की सदास फूलों की ज़िया से जादू-असरी गुम शोरीदा-सरी गुम हाँ तेरी जुदाई मथुरा को न भाई तू आए तो शान आए तू आए तो जान आए आना न अकेले हों साथ वो मेले सखियों के झमेले

Hafeez Jalandhari

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लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना ग़ज़ल-ख़्वाँ उस को जाना हम ने शाइ'र उस को गर्दाना फ़क़त सूरत ही देखी उस के मअ'नी हम नहीं समझे न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर मुक़य्यद अब नहीं 'इक़बाल' अपने जिस्म-ए-फ़ानी में नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी ज़िंदगी उस की त आला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की जिसे हम मुर्दा समझे ज़िंदा तर पाइंदा तर निकला मह ओ ख़ुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के

Hafeez Jalandhari

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नन्ही हो तुम बच्ची हो तुम सब अक़्ल की कच्ची हो तुम आओ मिरी बातें सुनो चालें सुनो घातें सुनो उस्ताद की हर बात को अपनी गिरह में बाँध लो जब तुम जवाँ हो जाओगी मछली की माँ हो जाओगी फिर याद आएँगी तुम्हें लहरे दिखाएँगी तुम्हें बातें हमारी मछलिओ ऐ प्यारी प्यारी मछलिओ रोहू की बेटी कान धर सांवल की बच्ची आ इधर और नन्ही मुन्नी तू भी सुन ओ थुन मथुन्नी तू भी सुन चौड़े दहाने वालियो और दुम हिलाने वालियो तुम भी सुनो चमकीलियो ऐ काली नीली पीलियो तुम को यहाँ पर देख कर नद्दी पे आ जाए अगर कोई शिकारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो जब वो किनारे बैठ कर डोरी को फेंकेगा इधर नन्हे से काँटे पर चढ़ा होगा मज़े का केचुआ लपकोगी तुम सब बे-ख़बर इक तर निवाला जान कर काँटा मगर चुभ जाएगा बस हल्क़ में खुब जाएगा तड़पोगी और घबराओगी लेकिन सभी फँस जाओगी तुम बारी बारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो जब केचुआ खा जाओ तुम बस लौट कर आ जाओ तुम लेकिन ज़रा सा छेड़ दो काँटे की पतली डोर को सरकंडा जब खिंच आएगा धोका शिकारी खाएगा समझेगा मछली फँस गई खींचेगा बंसी डोर की फिर शक्ल उस की देखना होती है कैसी देखना वो बे-क़रारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो अब वो बहुत झल्लाएगा चीख़ेगा और चिल्लाएगा फिर केचवे पर केचुआ काँटे में भरता जाएगा तुम भी इसी तरकीब से खाती ही जाना केचुवे आख़िर शिकारी हार कर उठेगा दिल को मार कर हीला-गरी रह जाएगी सारी धरी रह जाएगी थैली पिटारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो

Hafeez Jalandhari

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उट्ठी है मग़रिब से घटा पीने का मौसम आ गया है रक़्स में इक मह-लक़ा नाज़ुक अदा नाज़-आफ़रीं हाँ नाचती जा गाए जा नज़रों से दिल बर्माए जा तड़पाए जा तड़पाए जा ओ दुश्मन-ए-दुनिया-ओ-दीं! तेरा थिरकना ख़ूब है तेरी अदाएँ दिल-नशीं लेकिन ठहर तू कौन है ओ नीम-उर्यां नाज़नीं क्या मशरिक़ी औरत है तू हरगिज़ नहीं हरगिज़ नहीं तेरी हँसी बेबाक है तेरी नज़र चालाक है उफ़ किस क़दर दिल-सोज़ है तक़रीर बाज़ारी तिरी कितनी हवस-आमोज़ है ये सादा पुरकारी तिरी शर्म और इज़्ज़त वालियाँ होती हैं इफ़्फ़त वालियाँ वो हुस्न की शहज़ादियाँ पर्दे की हैं आबादियाँ चश्म-ए-फ़लक ने आज तक देखी नहीं उन की झलक सरमाया-ए-शर्म-ओ-हया ज़ेवर है उन के हुस्न का शौहर के दुख सहती हैं वो मुँह से नहीं कहती हैं वो कब सामने आती हैं वो ग़ैरत से कट जाती हैं वो एज़ाज़-ए-मिल्लत उन से है नाम-ए-शराफ़त उन से है ईमान पर क़ाएम हैं वो पाकीज़ा-ओ-साएम हैं वो तुझ में नहीं शर्म-ओ-हया तुझ में नहीं मेहर-ओ-वफ़ा सच सच बता तू कौन है ओ बे-हया तू कौन है एहसास-ए-इज़्ज़त क्यूँँ नहीं शर्म और ग़ैरत क्यूँँ नहीं ये पुर-फ़ुसूँ ग़म्ज़े तिरे ना-महरमों के सामने हट सामने से दूर हो मरदूद हो मक़हूर हो तक़दीर की हेटी है तू शैतान की बेटी है तू जिस क़ौम की औरत है तू उस क़ौम पर लअ'नत है तू लेकिन ठहर जाना ज़रा तेरी नहीं कोई ख़ता मर्दों में ग़ैरत ही नहीं क़ौमी हमीयत ही नहीं वो मिल्लत-ए-बैज़ा कि थी सारे जहाँ की रौशनी जमइय्यत-ए-इस्लामियाँ शाहनशह-ए-हिन्दोस्ताँ अब इस में दम कुछ भी नहीं हम क्या हैं हम कुछ भी नहीं मिल्ली सियासत उठ गई बाज़ू की ताक़त उठ गई शान-ए-हिजाज़ी अब कहाँ वो तुर्कताज़ी अब कहाँ अब ग़ज़नवी हिम्मत गई अब बाबरी शौकत गई ईमान आलमगीर का मुस्लिम के दिल से उठ गया क़ौम अब जफ़ा-पेशा हुई इज़्ज़त गदा-पेशा हुई अब रंग ही कुछ और है बे-ग़ैरती का दौर है ये क़ौम अब मिटने को है ये नर्द अब पिटने को है अफ़्सोस ये हिन्दोस्ताँ! ये गुलशन-ए-जन्नत-निशाँ! ईमान-दारों का वतन ताअ'त-गुज़ारों का वतन रह जाएगा वीराना फिर बन जाएगा बुत-ख़ाना फिर लेकिन मुझे क्या ख़ब्त है तक़रीर क्यूँँ बे-रब्त है ऐसा बहक जाता हूँ मैं मुँह आई बक जाता हूँ मैं इतना शराबी हो गया अक़्ल-ओ-ख़िरद को खो गया मुझ को ज़माने से ग़रज़ मिटने मिटाने से ग़रज़ हिन्दोस्ताँ से काम क्या अंदेशा-ए-अंजाम क्या जीने दो जीने दो मुझे पीने दो पीने दो मुझे जब हश्र का दिन आएगा उस वक़्त देखा जाएगा हाँ नाचती जा गाए जा नज़रों से दिल बर्माए जा तड़पाए जा तड़पाए जा ओ दुश्मन-ए-दुनिया-ओ-दीं

Hafeez Jalandhari

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