खिड़कियाँ खोल दो ज़ब्त की खिड़कियाँ खोल दो मैं खिलूँ जून की दोपहर में दिसम्बर की शब में सभी मौसमों के कटहरे में अपनी नफ़ी का मैं इसबात बन कर खिलूँ ख़्वाहिशों नींद की जंगली झाड़ियों अपने ही ख़ून की दलदलों में खिलूँ भाइयों की फटी आस्तीनों में बहनों के सज्दों में माँ-बाप के बे-ज़बाँ दर्द में अध-जले सिगरटों का तमाशा बनूँ हर नई सुब्ह के बस-स्टापों पे ठहरी हुई लड़कियों की किताबों में मस्लूब होने चलूँ मैं अपाहिज दिनों की नदामत बनूँ खिड़कियाँ खोल दो छोड़ दो रास्ते शहर-ए-बे-ख़्वाब में घूमने दो मुझे सुब्ह से शाम तक शाम से सुब्ह तक उस अँधेरे की इक इक करन चूमने दो मुझे जिस में बेज़ार लम्हों की साज़िश हुई और दहलों से नहले बड़े हो गए जिस में बे-नूर किरनों की बारिश हुई बहर-ए-शब-ज़ाद में जो सफ़ीने उतारे भँवर बन गए ख़्वाब में ख़्वाब के फूल खिलने लगे खिड़कियाँ खोल दो जागने दो मुझे
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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मैं सफ़र में हूँ मिरे जिस्म पर हैं हज़ार रंगों की यूरिशें कहीं सुर्ख़ फूल खिला हुआ कहीं नील है कहीं सब्ज़ रंग है ज़हर का मगर आइना शब-ए-शहर का मिरी ढाल है जो विसाल है वही अस्ल हिज्र-मिसाल है मिरे सामने वही रास्ते वही बाम-ओ-दर वही संग हैं वही सूलियाँ मुझे शाम आई है शहर में मुझे शाम आई है शहर में जहाँ आसमाँ की वुसअ'तों से सवाल कासा-ब-दस्त लौटे थे याद है शब हीला जो तुझे याद है वो सलीब जिस पे मचान नज्म-ए-सहर की थी वो ख़तीब जिस का ख़िताब अबरू हुआ से था वो सदा-ए-ज़ब्त अजीब थी कहीं कोढ़ियों की शिफ़ा बनी कहीं अब्र-ओ-बाद से चोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर से बड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाब पाँव की धूल हैं मैं सफ़र में हूँ मुझे शाम आई है शहर में मिरे हाथ में भी कमान है मुझे तीर दे
Jawayd Anwar
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किन हर्फ़ों की तफ़्हीम करूँँ किन रंगों की तज्सीम करूँँ किस राह चलूँ और चलता जाऊँ खुला नहीं अभी दरवाज़ा तो खुला नहीं किस फूल की मदह लिखूँ ऐ हर्फ़-ए-सहर-आसार ऐ यौम-ए-आज़ादी मैं ने तो नहीं देखा तिरे लम्स से कौन सा संग गुलाब हुआ आइना आब हुआ इस बाग़ में कौन सी मुश्त-ए-ख़ाक खुली ख़ुश्बू आज़ाद हुई बे-बस और सात बहारें और खिज़ाएँ एक ही मौसम की अजरक मैं देख चुका हूँ लेकिन मैं ने वो दिन किस दिन देखा है जब आँखें रौज़न छोड़ के फूलों की क्यारी में बस जाती हैं कोयल गाती है कोयल गाती है झूले पड़ते हैं बाग़ों में हुस्न से रेज़ा रेज़ा वस्ल टपकता है मैं ने कब देखा है अभी दरवाज़ा तो खुला नहीं अभी दरवाज़ा तो खुला नहीं दरवाज़ा खुले तो मैं भी क़लम में ताज़ा हवा की सियाही भर लूँ और इक ख़त लिखूँ मैं तेरे पते पर ख़त लिखूँ तू अपना तआ'रुफ़ भेज मैं तुझ पर इक प्यारी सी नज़्म लिखूँ कि सुना है तू भी प्यारा सा इक लम्स है इक लम्हा है लेकिन मैं ने तुझे कब चखा सूँघा देखा सुना महसूस किया है जब से मैं जागा हूँ तू तो जंत्रियों में मोरचा-बंद है सोया हुआ है जाग ऐ नादीदा साअत ऐ सदियों का अंदोह लिए लम्हे अब मुझ पर भी मुट्ठी भर सहर छिड़क बस एक झलक दिखला तेरी एक झलक मिरे पाँच हवा से की बख़िया बख़िया उधड़ी झोली सी भी देगी भर भी देगी फिर मैं तुझ पर इक ला-फ़ानी नज़्म लिखूँगा तुझे सुनाने आऊँगा
Jawayd Anwar
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ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा तुझे तो मैं ढूँडने चला था मुझे ख़बर ही नहीं थी तू मेरी उँगलियों में खिला हुआ है मिरे सदफ़ में तिरे ही मोती हैं मेरी जेबों में तेरे सिक्के खनक रहे हैं नवा-ए-गुमराह-ए-दश्त-ए-शब के नुजूम तेरी हथेलियों पर चहक रहे हैं मिरे ख़ला में तमाम सम्तें तिरे ख़ला से उतर रही हैं मुझे ख़बर ही न थी कि मेरी नज़र की ऐनक में तेरे शीशे जुड़े हुए हैं तुझे तो मैं ढूँडने चला था तुझे तो मैं ढूँडने चला था किसी सलीब-ए-कुहन पे दार-ओ-रसन के तारीक रास्तों की थकन में फ़रहाद कोहकन की सदा-ए-सद-चाक में किसी चूक मैं उबलते हुए लहू में खिले गुल तिफ़्ल-ए-बे-गुनह के बिखरते रंगों की उँगली था में तुझे तो मैं ढूँडने चला था शब-ए-तरब है शब-ए-तरब में न साज़ उतरे न नूर बिखरा न बादलों ने फुवार भेजी न झील ने माहताब उगला शब-ए-तरब है ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा शब-ए-तरब में मरी तलब का रबाब बन जा बुझी रगों में शराब बन जा ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा मिरी अँगेठी का ख़्वाब बन जा कि शब का आहन पिघलने तक मेरी चिमनियों के धुएँ में जुगनू मल्हार गाएँ
Jawayd Anwar
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वही क़स्में शब-ए-ना-मो'तबर की वही रस्में हैं शहर-ए-संग-दिल की वही दीवार-ए-बे-रौज़न कि जिस को ज़बानें दिन ढले तक चाटती हैं किसे पूछें बिरुन-ए-सहन क्या है कहाँ किस खेत में गंदुम उगी है कहाँ किस झील में सूरज गिरा है कहाँ हैं तेरी ज़िरहें मेरी ढालें कहाँ वो चाँद है जिस की तलब में ख़ला में फेंक दीं चेहरों ने आँखें कहाँ है इस घनी दीवार-ए-शब में इकहरी ईंट की चुनवाई पूछें कहाँ से कोई ख़िश्त-ए-ग़म उखाड़ें कहाँ दीवार में रौज़न बनाएँ
Jawayd Anwar
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हम ख़िज़ाँ की ग़ुदूद से चल कर ख़ुद दिसम्बर की कोख तक आए हम को फ़ुटपाथ पर हयात मिली हम पतंगों पे लेट कर रोए सूरजों ने हमारे होंटों पर अपने होंटों का शहद टपकाया और हमारी शिकम तसल्ली को जून की छातियों में दूध आया बर्फ़ बिस्तर बनी हमारे लिए और दोज़ख़ के सुर्ख़ रेशम से हम ने अपने लिए लिहाफ़ बुने ज़र्द शिरयान को धुएँ से भरा फेफड़ों पर सियाह राख मली नागा-साकी में फूल काश्त किए नज़्म बेरूत में मुकम्मल की लोरका को कलाई पर बाँधा हो-ची-मिन्ह को नियाम में रखा साढ़े लेनिन बजे स्कूल गए सुब्ह-ए-ईसा को शाम में रक्खा अरमुग़ान-ए-हिजाज़ में सोए होलीवुड की अज़ान पर जागे डाइरी में सुधार था लिखा दर्द को फ़लसफ़े की लोरी दी ज़ख़्म पर शाइ'री का फाहा रक्खा तन मशीनों की थाप पर थिरके दिल किताबों की ताल पर नाचा हम ने फ़िरऔन का क़सीदा लिखा हम ने कूफ़े में मरसिए बेचे हम ने बोसों का कारोबार किया हम ने आँखों के आइने बेचे ज़िंदगी की लगन नहीं हम को ज़िंदगी की हमें थकन भी नहीं हम कि हीरो नहीं विलेन भी नहीं
Jawayd Anwar
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