ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा तुझे तो मैं ढूँडने चला था मुझे ख़बर ही नहीं थी तू मेरी उँगलियों में खिला हुआ है मिरे सदफ़ में तिरे ही मोती हैं मेरी जेबों में तेरे सिक्के खनक रहे हैं नवा-ए-गुमराह-ए-दश्त-ए-शब के नुजूम तेरी हथेलियों पर चहक रहे हैं मिरे ख़ला में तमाम सम्तें तिरे ख़ला से उतर रही हैं मुझे ख़बर ही न थी कि मेरी नज़र की ऐनक में तेरे शीशे जुड़े हुए हैं तुझे तो मैं ढूँडने चला था तुझे तो मैं ढूँडने चला था किसी सलीब-ए-कुहन पे दार-ओ-रसन के तारीक रास्तों की थकन में फ़रहाद कोहकन की सदा-ए-सद-चाक में किसी चूक मैं उबलते हुए लहू में खिले गुल तिफ़्ल-ए-बे-गुनह के बिखरते रंगों की उँगली था में तुझे तो मैं ढूँडने चला था शब-ए-तरब है शब-ए-तरब में न साज़ उतरे न नूर बिखरा न बादलों ने फुवार भेजी न झील ने माहताब उगला शब-ए-तरब है ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा शब-ए-तरब में मरी तलब का रबाब बन जा बुझी रगों में शराब बन जा ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा मिरी अँगेठी का ख़्वाब बन जा कि शब का आहन पिघलने तक मेरी चिमनियों के धुएँ में जुगनू मल्हार गाएँ
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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इस रेतीले बदन की झुलसी हुई रगों में है तेल का तमाशा और बर्फ़ की तहों में है सूरजों का गिर्या या पानियों की दहशत या ख़ुश्क-सालियाँ हैं महताब से टपकता तारीकियों का लावा रुख़्सार दाग़ता है उस सुब्ह का सितारा चिड़ियों के घोंसलों में बारूद बाँटता है उन चोटियों पे परचम अंजान वादियों के और वादियों पे दाइम अंजान चोटियों के सायों की हुक्मरानी ये मेरे आँसुओं में रखी हुई धनक है उस हुस्न की कहानी नमकीन पानियों की तस्कीन बन रही है उन सब्ज़ गुम्बदों पर बैठे हुए कबूतर आँखें नहीं झपकते और बरगदों के पीछे सोए हुए पयम्बर ख़्वाबों में जागते हैं इन आइनों पे मिट्टी इन खिड़कियों में जाले ये जाम रेज़ा रेज़ा ये तिश्ना-लब नवा-गर ये बे-नवा गदागर और रेतीले बदन की झुलसी हुई रगों में है तेल का ख़ज़ाना इस बर्फ़ की तहों में इन सूरजों का गिर्या सैलाब कब बनेगा ये रेत कब धुलेगी इन ख़ुश्क टहनियों में महताब कब बनेगा सदियों का बोझ उठाए सदियों से मुंतज़िर हैं क़िर्तास-ए-अहमरीं पर धब्बे से रौशनी के ला-रैब ये रिसालत ला-रैब ये सहीफ़े लेकिन तिरे उजाले दीमक ही चाटती थी दीमक ही चाटती है
Jawayd Anwar
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मैं सफ़र में हूँ मिरे जिस्म पर हैं हज़ार रंगों की यूरिशें कहीं सुर्ख़ फूल खिला हुआ कहीं नील है कहीं सब्ज़ रंग है ज़हर का मगर आइना शब-ए-शहर का मिरी ढाल है जो विसाल है वही अस्ल हिज्र-मिसाल है मिरे सामने वही रास्ते वही बाम-ओ-दर वही संग हैं वही सूलियाँ मुझे शाम आई है शहर में मुझे शाम आई है शहर में जहाँ आसमाँ की वुसअ'तों से सवाल कासा-ब-दस्त लौटे थे याद है शब हीला जो तुझे याद है वो सलीब जिस पे मचान नज्म-ए-सहर की थी वो ख़तीब जिस का ख़िताब अबरू हुआ से था वो सदा-ए-ज़ब्त अजीब थी कहीं कोढ़ियों की शिफ़ा बनी कहीं अब्र-ओ-बाद से चोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर से बड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाब पाँव की धूल हैं मैं सफ़र में हूँ मुझे शाम आई है शहर में मिरे हाथ में भी कमान है मुझे तीर दे
Jawayd Anwar
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सूरज ढलता है और बम गिरता है और बम गिरते हैं सूरज ढलने से सूरज चढ़ने तक चढ़े हुए दिन में भी इधर उधर बम गिरते रहते हैं लेकिन कोई चीख़ सुनाई नहीं देती पहले देती थी अब कोई नहीं रोता गहरे गहरे गढ़े हैं और गढ़ों में गलता हुआ इंसानी मास है बचा-खुचा और चारों जानिब ईंटें पत्थर सरिया टूटे हुए दरवाज़े खिड़कियाँ कुत्ता बिल्ली चील और डरे डरे कुछ लोग उधर उधर से झाँकते हैं उधर उधर छुप जाते हैं बम गिरता है लेकिन एक खंडर में सिगरेट जलता है बुझता है जलता है डर ग़ुस्से में ढलता है रॉकेट चलता है रॉकेट चलता है दुनिया चीख़ती है और बम गिरता है तो किसी को सुनाई नहीं देता किसी को दिखाई नहीं देता
Jawayd Anwar
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किन हर्फ़ों की तफ़्हीम करूँँ किन रंगों की तज्सीम करूँँ किस राह चलूँ और चलता जाऊँ खुला नहीं अभी दरवाज़ा तो खुला नहीं किस फूल की मदह लिखूँ ऐ हर्फ़-ए-सहर-आसार ऐ यौम-ए-आज़ादी मैं ने तो नहीं देखा तिरे लम्स से कौन सा संग गुलाब हुआ आइना आब हुआ इस बाग़ में कौन सी मुश्त-ए-ख़ाक खुली ख़ुश्बू आज़ाद हुई बे-बस और सात बहारें और खिज़ाएँ एक ही मौसम की अजरक मैं देख चुका हूँ लेकिन मैं ने वो दिन किस दिन देखा है जब आँखें रौज़न छोड़ के फूलों की क्यारी में बस जाती हैं कोयल गाती है कोयल गाती है झूले पड़ते हैं बाग़ों में हुस्न से रेज़ा रेज़ा वस्ल टपकता है मैं ने कब देखा है अभी दरवाज़ा तो खुला नहीं अभी दरवाज़ा तो खुला नहीं दरवाज़ा खुले तो मैं भी क़लम में ताज़ा हवा की सियाही भर लूँ और इक ख़त लिखूँ मैं तेरे पते पर ख़त लिखूँ तू अपना तआ'रुफ़ भेज मैं तुझ पर इक प्यारी सी नज़्म लिखूँ कि सुना है तू भी प्यारा सा इक लम्स है इक लम्हा है लेकिन मैं ने तुझे कब चखा सूँघा देखा सुना महसूस किया है जब से मैं जागा हूँ तू तो जंत्रियों में मोरचा-बंद है सोया हुआ है जाग ऐ नादीदा साअत ऐ सदियों का अंदोह लिए लम्हे अब मुझ पर भी मुट्ठी भर सहर छिड़क बस एक झलक दिखला तेरी एक झलक मिरे पाँच हवा से की बख़िया बख़िया उधड़ी झोली सी भी देगी भर भी देगी फिर मैं तुझ पर इक ला-फ़ानी नज़्म लिखूँगा तुझे सुनाने आऊँगा
Jawayd Anwar
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अधूरी लड़कियो तुम अपने कमरों में पुराने साल के बोसीदा कैलन्डर सजा कर सोचती हो ये बदन 'उम्रों की साज़िश में न आएँगे तुम्हें किस ने बताया है घड़ी की सूइयों को रोकने से दौड़ता और हाँफता सूरज मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा अफ़्लाक पर जम जाएगा तुम्हें मालूम है उर्यानियों को ढाँप कर तुम और उर्यां हो रही हो रोज़ इन आँखों की तिकड़ी में तुम्हारे जिस्म तुलते हैं हर इक शब हॉस्टल में ताश की बाज़ी में तुम को जीत कर इक जश्न होता है हमारी ख़्वाब-गाहों में तुम्हारे ख़्वाब रौशन हैं चली आओ कि बाहर बर्फ़ है और अब हमें तुम से जुदा बिस्तर कहाँ तस्लीम करते हैं चली आओ कि 'उम्रें राएगाँ होने से बच जाएँ!
Jawayd Anwar
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