nazmKuch Alfaaz

सूरज ढलता है और बम गिरता है और बम गिरते हैं सूरज ढलने से सूरज चढ़ने तक चढ़े हुए दिन में भी इधर उधर बम गिरते रहते हैं लेकिन कोई चीख़ सुनाई नहीं देती पहले देती थी अब कोई नहीं रोता गहरे गहरे गढ़े हैं और गढ़ों में गलता हुआ इंसानी मास है बचा-खुचा और चारों जानिब ईंटें पत्थर सरिया टूटे हुए दरवाज़े खिड़कियाँ कुत्ता बिल्ली चील और डरे डरे कुछ लोग उधर उधर से झाँकते हैं उधर उधर छुप जाते हैं बम गिरता है लेकिन एक खंडर में सिगरेट जलता है बुझता है जलता है डर ग़ुस्से में ढलता है रॉकेट चलता है रॉकेट चलता है दुनिया चीख़ती है और बम गिरता है तो किसी को सुनाई नहीं देता किसी को दिखाई नहीं देता

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा तुझे तो मैं ढूँडने चला था मुझे ख़बर ही नहीं थी तू मेरी उँगलियों में खिला हुआ है मिरे सदफ़ में तिरे ही मोती हैं मेरी जेबों में तेरे सिक्के खनक रहे हैं नवा-ए-गुमराह-ए-दश्त-ए-शब के नुजूम तेरी हथेलियों पर चहक रहे हैं मिरे ख़ला में तमाम सम्तें तिरे ख़ला से उतर रही हैं मुझे ख़बर ही न थी कि मेरी नज़र की ऐनक में तेरे शीशे जुड़े हुए हैं तुझे तो मैं ढूँडने चला था तुझे तो मैं ढूँडने चला था किसी सलीब-ए-कुहन पे दार-ओ-रसन के तारीक रास्तों की थकन में फ़रहाद कोहकन की सदा-ए-सद-चाक में किसी चूक मैं उबलते हुए लहू में खिले गुल तिफ़्ल-ए-बे-गुनह के बिखरते रंगों की उँगली था में तुझे तो मैं ढूँडने चला था शब-ए-तरब है शब-ए-तरब में न साज़ उतरे न नूर बिखरा न बादलों ने फुवार भेजी न झील ने माहताब उगला शब-ए-तरब है ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा शब-ए-तरब में मरी तलब का रबाब बन जा बुझी रगों में शराब बन जा ऐ ख़्वाब-ए-ख़ंदा मिरी अँगेठी का ख़्वाब बन जा कि शब का आहन पिघलने तक मेरी चिमनियों के धुएँ में जुगनू मल्हार गाएँ

Jawayd Anwar

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वही क़स्में शब-ए-ना-मो'तबर की वही रस्में हैं शहर-ए-संग-दिल की वही दीवार-ए-बे-रौज़न कि जिस को ज़बानें दिन ढले तक चाटती हैं किसे पूछें बिरुन-ए-सहन क्या है कहाँ किस खेत में गंदुम उगी है कहाँ किस झील में सूरज गिरा है कहाँ हैं तेरी ज़िरहें मेरी ढालें कहाँ वो चाँद है जिस की तलब में ख़ला में फेंक दीं चेहरों ने आँखें कहाँ है इस घनी दीवार-ए-शब में इकहरी ईंट की चुनवाई पूछें कहाँ से कोई ख़िश्त-ए-ग़म उखाड़ें कहाँ दीवार में रौज़न बनाएँ

Jawayd Anwar

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मैं सफ़र में हूँ मिरे जिस्म पर हैं हज़ार रंगों की यूरिशें कहीं सुर्ख़ फूल खिला हुआ कहीं नील है कहीं सब्ज़ रंग है ज़हर का मगर आइना शब-ए-शहर का मिरी ढाल है जो विसाल है वही अस्ल हिज्र-मिसाल है मिरे सामने वही रास्ते वही बाम-ओ-दर वही संग हैं वही सूलियाँ मुझे शाम आई है शहर में मुझे शाम आई है शहर में जहाँ आसमाँ की वुसअ'तों से सवाल कासा-ब-दस्त लौटे थे याद है शब हीला जो तुझे याद है वो सलीब जिस पे मचान नज्म-ए-सहर की थी वो ख़तीब जिस का ख़िताब अबरू हुआ से था वो सदा-ए-ज़ब्त अजीब थी कहीं कोढ़ियों की शिफ़ा बनी कहीं अब्र-ओ-बाद से चोब-ए-ख़ुश्क तड़ख़ रही थी सवेर से बड़ी देर से यहाँ मरक़दों के गुलाब पाँव की धूल हैं मैं सफ़र में हूँ मुझे शाम आई है शहर में मिरे हाथ में भी कमान है मुझे तीर दे

Jawayd Anwar

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इस रेतीले बदन की झुलसी हुई रगों में है तेल का तमाशा और बर्फ़ की तहों में है सूरजों का गिर्या या पानियों की दहशत या ख़ुश्क-सालियाँ हैं महताब से टपकता तारीकियों का लावा रुख़्सार दाग़ता है उस सुब्ह का सितारा चिड़ियों के घोंसलों में बारूद बाँटता है उन चोटियों पे परचम अंजान वादियों के और वादियों पे दाइम अंजान चोटियों के सायों की हुक्मरानी ये मेरे आँसुओं में रखी हुई धनक है उस हुस्न की कहानी नमकीन पानियों की तस्कीन बन रही है उन सब्ज़ गुम्बदों पर बैठे हुए कबूतर आँखें नहीं झपकते और बरगदों के पीछे सोए हुए पयम्बर ख़्वाबों में जागते हैं इन आइनों पे मिट्टी इन खिड़कियों में जाले ये जाम रेज़ा रेज़ा ये तिश्ना-लब नवा-गर ये बे-नवा गदागर और रेतीले बदन की झुलसी हुई रगों में है तेल का ख़ज़ाना इस बर्फ़ की तहों में इन सूरजों का गिर्या सैलाब कब बनेगा ये रेत कब धुलेगी इन ख़ुश्क टहनियों में महताब कब बनेगा सदियों का बोझ उठाए सदियों से मुंतज़िर हैं क़िर्तास-ए-अहमरीं पर धब्बे से रौशनी के ला-रैब ये रिसालत ला-रैब ये सहीफ़े लेकिन तिरे उजाले दीमक ही चाटती थी दीमक ही चाटती है

Jawayd Anwar

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अधूरी लड़कियो तुम अपने कमरों में पुराने साल के बोसीदा कैलन्डर सजा कर सोचती हो ये बदन 'उम्रों की साज़िश में न आएँगे तुम्हें किस ने बताया है घड़ी की सूइयों को रोकने से दौड़ता और हाँफता सूरज मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा अफ़्लाक पर जम जाएगा तुम्हें मालूम है उर्यानियों को ढाँप कर तुम और उर्यां हो रही हो रोज़ इन आँखों की तिकड़ी में तुम्हारे जिस्म तुलते हैं हर इक शब हॉस्टल में ताश की बाज़ी में तुम को जीत कर इक जश्न होता है हमारी ख़्वाब-गाहों में तुम्हारे ख़्वाब रौशन हैं चली आओ कि बाहर बर्फ़ है और अब हमें तुम से जुदा बिस्तर कहाँ तस्लीम करते हैं चली आओ कि 'उम्रें राएगाँ होने से बच जाएँ!

Jawayd Anwar

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