मैं नौहा लिखता हूँ अपने ख़लियों के छलनी ख़्वाबों ऐ सर-ज़मीन-ए-हवस में फैले सराब-आसा खिले गुलाबों का मंज़रों के लहू में घुलती ग़लीज़ मिट्टी की बातों का मिरे वजूद सियह-बख़्ती में उजड़े अश्कों के गर्द साए क़फ़स बने में मैं दाएरों के महीन तारों की ना-तमामी में रेशा रेशा सिमट गया हूँ कहानियों के दबीज़ पर्दों की तह में उर्यां तुम्हारी आँखों की मुस्कुराहट अज़ाब बन कर मिरे सफ़र की हर एक मंज़िल में आ छुपी है मैं नौहा लिखता हूँ ज़र्द सोचों का काली साँसों का अपने होंटों के शमसी लफ़्ज़ों का ज़ाइक़ों का तुम्हारे सीने पे कुंडली मारे जो साँप बैठा है उस की ख़ूनी ज़बाँ का नौहा ख़ुद अपने बातिन के ख़ुश्क सहरा में उजले तारों की ताबनाकी का ख़्वाहिशों से भरी हवाओं की काएनातों का नौहा लिखता हूँ नौहा-ख़्वाँ हूँ
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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सर-ज़मीन-ए-तमन्ना की मिट्टी सलाख़ें उगाने लगी है गिरफ़्तार होने का मौसम सर-ए-क़र्या-ए-आबरू आफ़्ताब-ए-हलाकत की सूरत चमकने लगा है शुआ'ओं के नोकीले पंजों ने जिस्मों को ज़ख़्मी किया है भँवर दर भँवर रौशनी के समुंदर तूफ़ान क़ैदी हुए ये बस्ती गुनाहों से मा'मूर आफ़त-रसीदों की बस्ती है नौ-ज़ाइदा आरज़ू इंतिहाओं के इम्काँ समेटे ज़मीरों में लुथड़ी जराएम-ज़दा ख़्वाहिशों को मिटाए तो कैसे रगों के दरीचों से लिपटी फ़सीलों को रेज़ों की सूरत हवा में उछाले तो कैसे कि उस का नविश्ता फ़क़त अज़-सर-ए-नौ गिरफ़्तार होना ने दाएरों के तसल्लुत में जीना सियाही के बातिन में मौजूद ग़ारों में रहना हलाकत की सर-चश्मा-गाहों से आज़ाद रहने की अज़्मत से वाक़िफ़ हवाओ हमारी फ़सीलों की जानिब भी आओ हमें ये बताओ गिरफ़्तार होना हमारा नविश्ता नहीं था इरादों में मौजूद तौक़-ओ-सलासिल हवसनाक दहशत तमन्ना की मिट्टी में फ़ौलाद होते रहे हैं ख़ुद अपनी तवाना हक़ीक़त गिरफ़्तार करने से क़ासिर रहे मैं
Saadat Saeed
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शाम-ए-हंगाम तो हम है तसव्वुर के खटोलों पे सजी अपने अज्दाद के अय्याम की तस्वीरें दमक उठी हैं ऐसे लगता है कि ज़र्रों से निकलते थे क़मर ज़िंदगी रक़्स-कुनाँ नाज़ाँ-ओ-शादाब हुआ करती थी नद्दियाँ दूध की बहती थीं मोअ'त्तर थी हवा महफ़िल-ए-हस्त में हर सू थे रसीले पनघट सब्ज़ पेड़ों पे खिला करते थे नग़्मों के गुलाब वहशत-ए-आतिश-ए-औक़ात की इल्लत तो कुजा कोई दरमांदगी के नाम से वाक़िफ़ भी न था कितने मंज़र थे जिन्हें ख़ुल्द के मंज़र कहिए रूप की नगरी में संगीत के सागर कहिए आज चेहरों पे मसर्रत भी सरासीमा है वहशत-ए-आतिश-ए-औक़ात ने आफ़ात के शो'ले फेंके हर तरफ़ मौत के ज्वाला-मुखी का लावा साँस लेने से पिघल जाते हैं उड़ते पंछी अर्ज़-ए-तहज़ीब के सीने में नुमू-याफ़्ता ज़हरीले जुज़ाम क़ाफ़ गुलफ़ाम की आबादी को ले डूबे हैं वक़्त की गोद में सूखे बच्चे चार-सू घूमते लाग़र राँझे नए चंगेज़ नए नादिर-शाह आहन हो शरबा के शब-दीज़ काहिन मकतब-ए-नख़शब के फ़ुसूँ-कार बगूले हैं कि सरसाम के सर चश्में हैं गूँजते शहपर-ए-आसेब के ख़ूनी पंजे आदम-ए-शाएक़-ए-फ़ितरत के लिए क़ुफ़्ल अबजद भी हैं ज़ंजीरें भी रूप की नगरी में बहरूप के ताजिर आए दूर देसों के फ़ुसूँ-कार ज़र काग़ज़ राहत के लिए चार-सू कुश्तों के पुश्ते भी लगे हैं देखो किस क़दर ख़ून-बहा बाक़ी है आँखें पथराई हैं माँओं की ग़ुलामान-ए-रुसूम-ए-अमवाज अपनी अक़्लीम की मे'राज कहाँ बैठे हैं ज़र्रे ज़र्रे से निकलते हैं अँधेरे बिच्छू नदी नालों में हवाओं में लहू ख़ुल्द मशरिक़ में लहू जन्नत मग़रिब में लहू रूप की नगरी में संगीत के सागर में लहू मेरी मस्जिद में लहू आप के मंदिर में लहू देखना ग़ौर से ऐ चारागरो मेरी बकल में लहू आप की चादर में लहू
Saadat Saeed
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