सर-ज़मीन-ए-तमन्ना की मिट्टी सलाख़ें उगाने लगी है गिरफ़्तार होने का मौसम सर-ए-क़र्या-ए-आबरू आफ़्ताब-ए-हलाकत की सूरत चमकने लगा है शुआ'ओं के नोकीले पंजों ने जिस्मों को ज़ख़्मी किया है भँवर दर भँवर रौशनी के समुंदर तूफ़ान क़ैदी हुए ये बस्ती गुनाहों से मा'मूर आफ़त-रसीदों की बस्ती है नौ-ज़ाइदा आरज़ू इंतिहाओं के इम्काँ समेटे ज़मीरों में लुथड़ी जराएम-ज़दा ख़्वाहिशों को मिटाए तो कैसे रगों के दरीचों से लिपटी फ़सीलों को रेज़ों की सूरत हवा में उछाले तो कैसे कि उस का नविश्ता फ़क़त अज़-सर-ए-नौ गिरफ़्तार होना ने दाएरों के तसल्लुत में जीना सियाही के बातिन में मौजूद ग़ारों में रहना हलाकत की सर-चश्मा-गाहों से आज़ाद रहने की अज़्मत से वाक़िफ़ हवाओ हमारी फ़सीलों की जानिब भी आओ हमें ये बताओ गिरफ़्तार होना हमारा नविश्ता नहीं था इरादों में मौजूद तौक़-ओ-सलासिल हवसनाक दहशत तमन्ना की मिट्टी में फ़ौलाद होते रहे हैं ख़ुद अपनी तवाना हक़ीक़त गिरफ़्तार करने से क़ासिर रहे मैं
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
Allama Iqbal
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"तुम्हारा ख़याल" भोर में सूरज की हल्की रौशनी से जब नदी का जल चमक जाता है तुम्हारा अक्स मुझे नज़र आता है निशा में; महताब की चाँदनी तले टिमटिमाते तारों को देखता हूँ तुम्हारा चेहरा निखर आता है हल्की बारिश के बा'द मिट्टी से आने वाली गंध सी हो तुम किसी पवित्र ग्रंथ सी हो तुम लापता हूँ मैं ख़ुद ही में मुझ में बसी हो तुम रूह की रूहानियत हो आँखों की नमी हो तुम तुम्हारी आवाज़ कोयल की मीठी बोली सी लगती हँ तुम हो तो मैं हूँ तुम्हीं से मेरी साँसे चलती हैं पंछियों की चहचहाहट से तुम्हारा मुस्कुराना याद आता है जब भी इबादत करे 'प्रीत' तुम्हारा ज़िक्र हो ही जाता है
Prit
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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
Ammar Iqbal
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मैं नौहा लिखता हूँ अपने ख़लियों के छलनी ख़्वाबों ऐ सर-ज़मीन-ए-हवस में फैले सराब-आसा खिले गुलाबों का मंज़रों के लहू में घुलती ग़लीज़ मिट्टी की बातों का मिरे वजूद सियह-बख़्ती में उजड़े अश्कों के गर्द साए क़फ़स बने में मैं दाएरों के महीन तारों की ना-तमामी में रेशा रेशा सिमट गया हूँ कहानियों के दबीज़ पर्दों की तह में उर्यां तुम्हारी आँखों की मुस्कुराहट अज़ाब बन कर मिरे सफ़र की हर एक मंज़िल में आ छुपी है मैं नौहा लिखता हूँ ज़र्द सोचों का काली साँसों का अपने होंटों के शमसी लफ़्ज़ों का ज़ाइक़ों का तुम्हारे सीने पे कुंडली मारे जो साँप बैठा है उस की ख़ूनी ज़बाँ का नौहा ख़ुद अपने बातिन के ख़ुश्क सहरा में उजले तारों की ताबनाकी का ख़्वाहिशों से भरी हवाओं की काएनातों का नौहा लिखता हूँ नौहा-ख़्वाँ हूँ
Saadat Saeed
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शाम-ए-हंगाम तो हम है तसव्वुर के खटोलों पे सजी अपने अज्दाद के अय्याम की तस्वीरें दमक उठी हैं ऐसे लगता है कि ज़र्रों से निकलते थे क़मर ज़िंदगी रक़्स-कुनाँ नाज़ाँ-ओ-शादाब हुआ करती थी नद्दियाँ दूध की बहती थीं मोअ'त्तर थी हवा महफ़िल-ए-हस्त में हर सू थे रसीले पनघट सब्ज़ पेड़ों पे खिला करते थे नग़्मों के गुलाब वहशत-ए-आतिश-ए-औक़ात की इल्लत तो कुजा कोई दरमांदगी के नाम से वाक़िफ़ भी न था कितने मंज़र थे जिन्हें ख़ुल्द के मंज़र कहिए रूप की नगरी में संगीत के सागर कहिए आज चेहरों पे मसर्रत भी सरासीमा है वहशत-ए-आतिश-ए-औक़ात ने आफ़ात के शो'ले फेंके हर तरफ़ मौत के ज्वाला-मुखी का लावा साँस लेने से पिघल जाते हैं उड़ते पंछी अर्ज़-ए-तहज़ीब के सीने में नुमू-याफ़्ता ज़हरीले जुज़ाम क़ाफ़ गुलफ़ाम की आबादी को ले डूबे हैं वक़्त की गोद में सूखे बच्चे चार-सू घूमते लाग़र राँझे नए चंगेज़ नए नादिर-शाह आहन हो शरबा के शब-दीज़ काहिन मकतब-ए-नख़शब के फ़ुसूँ-कार बगूले हैं कि सरसाम के सर चश्में हैं गूँजते शहपर-ए-आसेब के ख़ूनी पंजे आदम-ए-शाएक़-ए-फ़ितरत के लिए क़ुफ़्ल अबजद भी हैं ज़ंजीरें भी रूप की नगरी में बहरूप के ताजिर आए दूर देसों के फ़ुसूँ-कार ज़र काग़ज़ राहत के लिए चार-सू कुश्तों के पुश्ते भी लगे हैं देखो किस क़दर ख़ून-बहा बाक़ी है आँखें पथराई हैं माँओं की ग़ुलामान-ए-रुसूम-ए-अमवाज अपनी अक़्लीम की मे'राज कहाँ बैठे हैं ज़र्रे ज़र्रे से निकलते हैं अँधेरे बिच्छू नदी नालों में हवाओं में लहू ख़ुल्द मशरिक़ में लहू जन्नत मग़रिब में लहू रूप की नगरी में संगीत के सागर में लहू मेरी मस्जिद में लहू आप के मंदिर में लहू देखना ग़ौर से ऐ चारागरो मेरी बकल में लहू आप की चादर में लहू
Saadat Saeed
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