कभी लड़कियों के तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखने को मकानों की छत पर खड़े हो के यारो जो हम नंगे पाँव के तलवे जलाते तो अपने बदन की हरारत से सारी नसें फड़फड़ातीं मगर लड़कियों को ख़बर तक न होती अगर अब मकानों की ऊँची छतों पर खड़े हो के तुम ने तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखनी हों तो तलवे जलाने से बेहतर यही है कि कुछ गुनगुनाओ तुम्हारे बदन की नसें सर्द करने को सब लड़कियाँ बा-ख़बर हो चुकी हैं
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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सर्दियों के मौसम में पिछली रात को छत पर हम जो एक दूजे से चाँदनी की बारिश में बे-ज़बान जज़्बों की ख़ुशबुओं से मिलते थे हुस्न-ए-दिलरुबा तेरा लफ़्ज़ की हक़ीक़त से कितना बे-तअल्लुक़ था अन-कहा सुना सब कुछ लम्हा-ए-मसर्रत था जब से लब-कुशाई के सिलसिले हुए जारी तेरी मेरी बहसों ने अन-कहा सुना सब कुछ मंतिक़ों दलीलों के वाहिमों से गदलाया और फिर मोहब्बत के सब गुलाब सँवलाए आज अज्नबिय्यत की बे-समर फ़ज़ाओं में हम कि एक दूजे से कितने बे-तअल्लुक़ हैं अव्वलीं रिफ़ाक़त की सारी ख़स्लतें खो कर इस बिसात-ए-हस्ती पर सिर्फ़ दो पयादे हैं
Yusuf Kamran
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ये आग पानी हवा ये मिट्टी ये वाहिमों की करिश्मा-साज़ी ये इल्म-ओ-फ़न के तमाम क़िस्से ये अक़्ल-ओ-दानिश की सारी बातें ये सब दिलासे बनावटी हैं मैं दोस्तों दुश्मनों की ज़द में हूँ हर कोई पेश-गोइयों के दराज़ क़िस्से सुना रहा है कि सब को अपने करंसी नोटों की फ़िक्र है हर कोई तलब और रसद के चक्कर में अपने भाव चढ़ा रहा है खुली फ़ज़ाओं में पर समेटे हुए परिंदे भी आने वाली सऊबतों के मुहीब मंज़र दिखा रहे हैं ये क्या है सब कुछ कि कुछ नहीं है हवा से की दस्तरस से बाला मिरे लिए सिर्फ़ वो सदाक़त है जो मिरे जिस्म-ओ-जाँ को छू कर गुज़र रही है कि मैं हक़ीक़ी मुशाहिदों तजरबों की भट्टी में जल रहा हूँ ये आग पानी हवा न मिट्टी है सिर्फ़ मैं हूँ ये सिर्फ़ मैं हूँ
Yusuf Kamran
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रात फिर यूँँ हुआ अध खुले आसमाँ पर परिंदों की चीख़ों में लिपटे हुए ख़्वाहिशों के बदन तिलमिलाने लगे मेरे कानों में मेरे दहकते हुए ख़ून की रंग की नूर की सीटियाँ सी बजीं फिर इरादों की छाती में नीली रगें मुंजमिद हो गईं फिर बदन की फ़सीलों के साए बने जुम्बिशों में वही सरसराहट हुई फिर मिरे जिस्म की दूधिया चाँदनी हर तरफ़ छा गई और मैं जिस्म-ओ-जाँ की शिकन-दर-शिकन उलझनों को समेटे हुए सो गया रात फिर यूँँ हुआ
Yusuf Kamran
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सजा सजाया ये घर सलीक़े की सारी चीज़ें तमाम कमरों में किस क़रीने से सज रही हैं ये बंद अलमारियों में रक्खी हुई किताबें ये टेलीविज़न ये रेडियो ये फ्रीज ये सोफ़े ये मेज़ कुर्सी ये नर्म बिस्तर ये बिस्तरों की गुदाज़ रातें हसीन सुब्हें ये मेरी बीवी ये मेरे बच्चे ये सारी आसाइशें ये रस्में ये सारे रिश्ते ये सारे बंधन मैं जिन की साँसों में बस रहा हूँ ये सब तो मेरे हैं मैं कहाँ हूँ
Yusuf Kamran
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कल शाम नहर की पटरी के साथ साथ मैं अपने ना-तवाँ कंधों पर एक शिकस्ता बोरी उठाए जा रहा था कि चीख़-ओ-पुकार शुरूअ' हुई पकड़ो पकड़ो क़ातिल क़ातिल नहर पर मुतअय्यन पुलीस चौकी के मुस्तइद अमले ने संगीनों से मेरा तआ'क़ुब किया मैं अपनी तमाम-तर क़ुव्वत से भागने के बावजूद चंद ही लम्हों में उन की आहनी गिरफ़्त में था पुलीस चौकी में सवालों की बोछाड़ से मेरी क़ुव्वत-ए-गोयाई जवाब दे गई एक मकरूह सूरत मोंछों वाला बा-वर्दी शख़्स वहशत-नाक आँखों से अमले की तरफ़ देखते हुए अपनी शदीद करख़्त आवाज़ में चीख़ा बोरी का मुँह खोलो सारा अमला शश्दर रह गया कि बोरी में लिपटी हुई लाश मेरी ही थी और मैं चुप साधे उसे तक रहा था
Yusuf Kamran
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