nazmKuch Alfaaz

है दिलाती याद मय-नोशी फ़ज़ा बरसात की दिल बढ़ा जाती है आ आ कर घटा बरसात की बंध गई है रहमत-ए-हक़ से हवा बरसात की नाम खुलने का नहीं लेती घटा बरसात की उग रहा है हर तरफ़ सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर इंतिहा गर्मी की है और इब्तिदा बरसात की देखना सूखी हुई शाख़ों में भी जान आ गई हक़ में पौदों के मसीहा है हवा बरसात की हों शरीक-ए-बज़्म-ए-मय ज़ाहिद भी तौबा तोड़ कर झूमती क़िबले से उट्ठी है घटा बरसात की अस्ल तो ये है मय-ओ-माशूक़ का जब लुत्फ़ है चाँदनी हो रात को दिन को घटा बरसात की वो पपीहों की सदाएँ और वो मोरों का रक़्स वो हवा-ए-सर्व और काली घटा बरसात की पार उतर जाएँगे बहर-ए-ग़म से रिंद-ए-बादा-नोश ले उड़ेगी कश्ती-ए-मय को हवा बरसात की ख़ुद-ब-ख़ुद ताज़ा उमंगें जोश पर आने लगीं दिल को गरमाने लगी ठंडी हवा बरसात की वो दुआएँ मय-कशों की और वो लुत्फ़-ए-इंतिज़ार हाए किन नाज़ों से चलती है हवा बरसात की मैं ये समझा अब्र के रंगीन टुकड़े देख कर तख़्त परियों के उड़ लाई हवा बरसात की नाज़ हो जिस को बहार-ए-मिस्र-ओ-शाम-ओ-रूम पर सर-ज़मीन-ए-हिंद में देखे फ़ज़ा बरसात की

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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दर्द है दिल के लिए और दिल इंसाँ के लिए ताज़गी बर्ग-ओ-समर की चमनिस्ताँ के लिए साज़-ए-आहंग-ए-जुनूँ तार-ए-रग-ए-जाँ के लिए बे-ख़ुदी शौक़ की बे-सर-ओ-सामाँ के लिए क्या कहूँ कौन हवा सर में भरी रहती है बे पिए आठ-पहर बे-ख़बरी रहती है न हूँ शाइ'र न वली हूँ न हूँ एजाज़-ए-बयाँ बज़्म-ए-क़ुदरत में हूँ तस्वीर की सूरत हैराँ दिल में इक रंग है लफ़्ज़ों से जो होता है अयाँ लय की मुहताज नहीं है मिरी फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ शौक़-ए-शोहरत हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार नहीं दिल वो यूसुफ़ है जिसे फ़िक्र-ए-ख़रीदार नहीं और होंगे जिन्हें रहता है मुक़द्दर से गिला और होंगे जिन्हें मिलता नहीं मेहनत का सिला मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला क्यूँँ डराते हैं अबस गबरू मुसलमाँ मुझ को क्या मिटाएगी भला गर्दिश-ए-दौराँ मुझ को क्या ज़माना पे खुले बे-ख़बरी का मिरी राज़ ताइर-ए-फ़िक्र में पैदा तो हो इतनी परवाज़ क्यूँँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़ हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़ फ़ख़्र है मुझ को उसी दर से शरफ़ पाने का मैं शराबी हूँ उसी रिंद के मयख़ाने का दिल मिरा दौलत-ए-दुनिया का तलबगार नहीं ब-ख़ुदा ख़ाक-नशीनी से मुझे आर नहीं मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं अपने ही दिल का पियाला पिए मदहोश हूँ मैं झूटी पीता नहीं मग़रिब की वो मय-नोश हूँ मैं क़ौम के दर्द से हूँ सोज़-ए-वफ़ा की तस्वीर मेरी रग रग से है पैदा तप-ए-ग़म की तासीर है मगर आज नज़र में वो बहार-ए-दिल-गीर कर दिया दिल को फ़रिश्तों ने तरब के तस्ख़ीर ये नसीम-ए-सहरी आज ख़बर लाई है साल गुज़रा मिरे गुलशन में बहार आई है क़ौम में आठ बरस से है ये गुलशन शादाब चेहरा-ए-गुल पे यहाँ पास-ए-अदब की है नक़ाब मेरे आईना-ए-दिल में है फ़क़त इस का जवाब उस के काँटों पे किया मैं ने निसार अपना शबाब काम शबनम का लिया दीदा-ए-तर से अपने मैं ने सींचा है उसे ख़ून-ए-जिगर से अपने हर बरस रंग पे आता ही गया ये गुलज़ार फूल तहज़ीब के खिलते गए मिटते गए ख़ार पत्ती पत्ती से हुआ रंग-ए-वफ़ा का इज़हार नौजवानान-ए-चमन बन गए तस्वीर-ए-बहार रंग-ए-गुल देख के दिल क़ौम का दीवाना हुआ जो था बद-ख़्वाह-ए-चमन सब्ज़ा-ए-बेगाना हुआ बू-ए-नख़वत से नहीं याँ के गुलों को सरोकार है बुज़ुर्गों का अदब इन की जवानी का सिंगार इल्म-ओ-ईमाँ की तरावत का दिलों में है गुज़ार धो गए चश्मा-ए-अख़लाक़ से सीनों के ग़ुबार रंग दिखलाती है यूँँ दिल की सफ़ा यारों में रौशनी सुब्ह की जिस तरह हो गुलज़ारों में किस को मा'लूम थी इस गुलशन-ए-अख़्लाक़ की राह मैं ने फूलों को किया रंग-ए-वफ़ा से आगाह अब तो इस बाग़ पे है सब की मोहब्बत की निगाह जो कि पौदे थे शजर हो गए माशा-अल्लाह क्या कहूँ रंग-ए-जवानी में जो इस राग के थे बाग़बाँ हो गए गुलचीं जो मेरे बाग़ के थे गो कि बाक़ी नहीं कैफ़िय्यत-ए-तूफ़ान-ए-शबाब फँस के जंजाल में दुनिया के ये क़िस्सा हुआ ख़्वाब मस्त रहता है मगर अब भी दिल-ए-ख़ाना-ख़राब शाम को बैठ के महफ़िल में लुंढाता हूँ शराब नश्शा-ए-इल्म की उम्मीद पे जीने वाले सिमट आते हैं सर-ए-शाम से पीने वाले और ही रंग पे है आज बहार-ए-गुलशन सैर के वास्ते आए हैं अज़ीज़ान-ए-वतन फ़र्श आँखें किए बैठे हैं जवानान-ए-चमन दिल में तूफ़ान-ए-तरब लब पे मोहब्बत के सुख़न कौन है आज जो इस बज़्म में मसरूर नहीं रूह-ए-सरशार भी खिंच आए तो कुछ दूर नहीं मगर अफ़्सोस ये दुनिया है मक़ाम-ए-इबरत रंज की याद दिलाता है ख़याल-ए-राहत आज याद आती है उन फूलों की मुझ को सूरत खिलते ही कर गए जो मेरे चमन से रेहलत चश्म-ए-बद-दूर गुलों की ये भरी डाली है चंद फूलों की मगर इस में जगह ख़ाली है ये वो गुल थे जिन्हें अरबाब-ए-नज़र ने रोया भाई ने बहनों ने मादर ने पिदर ने रोया ख़ाक रोना था जो इस दीदा-ए-तर ने रोया मुद्दतों इन को मिरे क़ल्ब-ओ-जिगर ने रोया दिल के कुछ दाग़-ए-मोहब्बत हैं निशानी उन की बचपना देख के देखी न जवानी उन की ख़ैर दुनिया में कभी सोज़ है और कभी है साज़ नौनिहालान-ए-चमन की रहे अब उम्र दराज़ भाई से बढ़ के मुझे हैं ये मेरे माया-नाज़ मेरे मोनिस हैं यही और यही मेरे हमराज़ मर के भी रूह मिरी दिल की तरह शाद रहे मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे

Chakbast Brij Narayan

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फ़ैज़-ए-क़ुदरत से जो तक़दीर खुली आलम की साहिल-ए-हिन्द पे वहदत की तजल्ली चमकी मिट गई जहल की शब सुब्ह का तारा चमका आर्य-वर्त की क़िस्मत का सितारा चमका अहल-ए-दिल पर हुई कैफ़िय्यत-ए-इरफ़ाँ तारी जिन से दुनिया में हुईं दीन की नहरें जारी थीं खुली जल्वा-गह-ए-ख़ास में राहें उन की वाक़िफ़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त थीं निगाहें उन की अर्श से उन के लिए नूर-ए-ख़ुदा आया था बंदा-ए-खास थे ऋषियों का लक़ब पाया था वेद उन के दिल-ए-हक़-केश की तस्वीरें हैं जल्वा-ए-क़ुदरत-ए-माबूद की तफ़्सीरें हैं ऐन कसरत में ये वहदत का सबक़ वेद में है एक ही नूर है जो ज़र्रा ओ ख़ुरशेद में है जिस से इंसान में है जोश-ए-जवानी पैदा इसी जौहरस है मौजों में रवानी पैदा रंग गुलशन में फ़ज़ा दामन-ए-कोहसार में है ख़ूँ रग-ए-गुल में है नश्तर की ख़लिश ख़ार में है तमकनत हुस्न में है जोश है दीवाने में रौशनी शम्अ'' में है नूर है परवाने में रंग-ओ-बू हो के समाया वही गुलज़ारों में अब्र बन कर वही बरसा किया कोहसारों में शौक़ हो कर दिल-ए-मज्ज़ूब पे छाया है वही दर्द बन कर दिल-ए-शाइ'र में समाया है वही नूर-ए-ईमाँ से जो पैदा हो सफ़ा सीने में अक्स उस का नज़र आता है इस आईने में

Chakbast Brij Narayan

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ज़मीन हिन्द की रुत्बा में अर्श-ए-आ'ला है ये होम-रूल की उम्मीद का उजाला है मिसिज़-बेसेंट ने इस आरज़ू को पाला है फ़क़ीर क़ौम के हैं और ये राग माला है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले वतन-परस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे हम अपनी आँख का सुर्मा उसे बनाएँगे ग़रीब माँ के लिए दर्द-दुख उठाएँगे यही पयाम-ए-वफ़ा क़ौम को सुनाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले हमारे वास्ते ज़ंजीर-ओ-तौक़ गहना है वफ़ा के शौक़ में गाँधी ने जिस को पहना है समझ लिया कि हमें रंज-ओ-दर्द सहना है मगर ज़बाँ से कहेंगे वही जो कहना है तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले पहनाने वाले अगर बेड़ियाँ पहनाएँगे ख़ुशी से क़ैद के गोशे को हम बसाएँगे जो संतरी दर-ए-ज़िंदाँ के भी सो जाएँगे ये राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़ ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़ रहेगा जान के हम-राह दिल का सोज़-ओ-गुदाज़ चिता से आएगी मरने के बा'द ये आवाज़ तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही दुआ है वतन के शिकस्ता हालों की यही उमंग जवानी के नौनिहालों की जो रहनुमा है मोहब्बत पे मिटने वालों की हमें क़सम है उसी के सपेद बालों की तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले यही पयाम है कोयल का बाग़ के अंदर इसी हवा में है गंगा का ज़ोर आठ-पहर हिलाल-ए-ईद ने दी है यही दिलों को ख़बर पुकारता है हिमाला से अब्र उठ उठ कर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले बसे हुए हैं मोहब्बत से जिन की क़ौम के घर वतन का पास है उन को सुहाग से बढ़ कर जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर तलब फ़ुज़ूल है काँटे की फूल के बदले न लें बहिश्त भी हम होम-रूल के बदले

Chakbast Brij Narayan

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मौत ने रात के पर्दे में किया कैसा वार रौशनी-ए-सुब्ह वतन की है कि मातम का ग़ुबार मा'रका सर्द है सोया है वतन का सरदार तनतना शे'र का बाक़ी नहीं सूना है कछार बेकसी छाती है तक़दीर फिरी जाती है क़ौम के हाथ से तलवार गिरी जाती है उठ गया दौलत-ए-नामूस-ए-वतन का वारिस क़ौम मरहूम के एज़ाज़-ए-कुहन का वारिस जाँ-निसार-ए-अज़ली शेर-ए-दकन का वारिस पेशवाओं के गरजते हुए रन का वारिस थी समाई हुई पूना की बहार आँखों में आख़िरी दौर का बाक़ी था ख़ुमार आँखों में मौत महाराष्ट्र की थी या तिरी मरने की ख़बर मुर्दनी छा गई इंसान तो क्या पत्थर पर पत्तियाँ झुक गईं मुरझा गए सहरा के शजर रह गए जोश में बहते हुए दरिया थम कर सर्द-ओ-शादाब हवा रुक गई कोहसारों की रौशनी घट गई दो-चार घड़ी तारों की था निगहबान-ए-वतन दबदबा-ए-आम तिरा न डिगें पाँव पे था क़ौम को पैग़ाम दिल रक़ीबों के लरज़ते थे ये था काम तेरा नींद से चौंक पड़े सुन जो लिया नाम तेरा याद कर के तुझे मज़लूम-ए-वतन रोएँगे बंदा-ए-रस्म-ए-जफ़ा चैन से अब सोएँगे ज़िंदगी तेरी बहार चमनिस्तान-ए-वफ़ा आबरू तेरे लिए क़ौम से पैमान-ए-वफ़ा आशिक़-ए-नाम-ए-वतन कुश्ता-ए-अरमान-ए-वफ़ा मर्द-ए-मैदान-ए-वफ़ा जिस्म-ए-वफ़ा जान-ए-वफ़ा हो गई नज़्र-ए-वतन हस्ती-ए-फ़ानी तेरी न तो पीरी रही तेरी न जवानी तेरी औज-ए-हिम्मत पे रहा तेरी वफ़ा का ख़ुर्शेद मौत के ख़ौफ़ पे ग़ालिब रही ख़िदमत की उमेद बन गया क़ैद का फ़रमान भी राहत की नवेद हुए तारीकी-ए-ज़िंदाँ में तिरे बाल सपेद फिर रहा है मिरी नज़रों में सरापा तेरा आह-ओ-क़ैद-ए-सितम और बुढ़ापा तेरा मो'जिज़ा अश्क-ए-मोहब्बत का दिखाया तू ने एक क़तरा से ये तूफ़ान उठाया तू ने मुल्क को हस्ती-ए-बेदार बनाया तू ने जज़्बा-ए-क़ौम को जादू को जगाया तू ने इक तड़प आ गई सोते हुए अरमानों में बिजलियाँ कौंद गईं क़ौम के वीरानों में लाश को तेरी सँवारें न रफ़ीक़ान-ए-कुहन हो जबीं के लिए संदल की जगह ख़ाक-ए-वतन तर हुआ है जो शहीदों के लहू से दामन दें उसी का तुझे पंजाब के मज़लूम कफ़न शोर-ए-मातम न हो झंकार हो ज़ंजीरों की चाहिए क़ौम के भीषम को चिता तीरों की

Chakbast Brij Narayan

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हुब्ब-ए-क़ौमी का ज़बाँ पर इन दिनों अफ़्साना है बादा-ए-उल्फ़त से पुर दिल का मिरे पैमाना है जिस जगह देखो मोहब्बत का वहाँ अफ़्साना है इश्क़ में अपने वतन के हर बशर दीवाना है जब कि ये आग़ाज़ है अंजाम का क्या पूछना बादा-ए-उल्फ़त का ये तो पहला ही पैमाना है है जो रौशन बज़्म में क़ौमी तरक़्क़ी का चराग़ दिल फ़िदा हर इक का उस पर सूरत-ए-परवाना है मुझ से इस हमदर्दी-ओ-उल्फ़त का क्या होवे बयाँ जो है वो क़ौमी तरक़्क़ी के लिए दीवाना है लुत्फ़ यकताई में जो है वो दुई में है कहाँ बर-ख़िलाफ़ इस के जो हो समझो कि वो दीवाना है नख़्ल-ए-उल्फ़त जिन की कोशिश से उगा है क़ौम में क़ाबिल-ए-तारीफ़ उन की हिम्मत-ए-मर्दाना है है गुल-ए-मक़्सूद से पुर गुलशन-ए-कश्मीर आज दुश्मनी ना-इत्तिफ़ाक़ी सब्ज़ा-ए-बेगाना है दुर-फ़िशाँ है हर ज़बाँ हुब्ब-ए-वतन के वस्फ़ में जोश-ज़न हर सम्त बहर-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना है ये मोहब्बत की फ़ज़ा क़ाएम हुई है आप से आप का लाज़िम तह-ए-दिल से हमें शुक्राना है हर बशर को है भरोसा आप की इमदाद पर आप की हमदर्दियों का दूर दूर अफ़्साना है जम्अ'' हैं क़ौमी तरक़्क़ी के लिए अर्बाब-ए-क़ौम रश्क-ए-फ़िरदौस उन के क़दमों से ये शादी-ख़ाना है

Chakbast Brij Narayan

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